मेरा बयान बहस का मुद्दा
लेबल साक्षात्कार स्टोरी राजनीति, साक्षात्कार
"भाजपा के लोगों को मालामाल किया जा रहा"

(रायपुर, 24 अप्रैल 2008, दोपहर 11.30 बजे)
00 कांग्रेस शासनकाल में जनभावना के अनुरूप जो व्यवस्था थी, उसे लोग आज भी याद करते हैं। भाजपा के शासनकाल में सर्वाधिक भ्रष्टाचार हुआ जो किसी से छुपा नहीं है। चाहे वह रतनजोत की आड़ में किया गया भ्रष्टाचार हो, मोवा धान घोटाला हो, चावल की अफरातफरी हो, जिस गोदाम की क्षमता 10 हजार मीट्रिक टन नहीं है वहां ये उससे कई गुना यादा स्टोरेज बताते हैं। कुल मिलाकर भाजपा का सारा काम कागजी ही रहा है। कांग्रेस का मुख्य मुद्दा भाजपा का भ्रष्टाचार रहेगा। इन्होंने भय, भूख और भ्रष्टाचार मिटाने की बात अपने घोषणापत्र में कही थी, लेकिन इनके कार्यकाल में भय बढ़ा है, गांवों में भाजपा के कार्यकर्ता लोगों को डराते-धमकाते हैं, झूठे मामलों में फंसाते हैं। इन्होंने सैकड़ों समस्या समाधान शिविर लगाए पर लोगों को कोई राहत नहीं मिली। अभी ग्राम सुराज में भी वही किया जा रहा जिससे कोई हल निकलने वाला नहीं है। गर्मी में जनता पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही है। वह सारी बात जानती-समझती है, पर इस समय खामोश है और यही खामोशी भाजपा के लिए खतरा है। भाजपा के शासन में अफसरशाही बढ़ी है, निरंकुशता बढ़ी है, नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाकर अपने ढंग से इसने काम किया है। भाजपा के लोग पूरे समय अपनी जेबें भरने में लगे रहे, मालामाल हो गए और जनता गरीब होती जा रही है। इन मुद्दों के साथ ही केंद्र की यूपीए सरकार द्वारा किसानों का कर्ज माफ करना, रोजगार गांरटी योजना के माध्यम से बेरोजगारों को रोजगार देना आदि हमारी पार्टी के मुद्दे रहेंगे।
0. भाजपा के लोग कहते हैं कि आपकी पार्टी में गुटबाजी हावी है जिसका उन्हें लाभ मिलेगा?
00. यह भाजपा का सपना है। हमारी पार्टी विशाल है, इसका इतिहास 125 वर्ष पुराना है। बड़ी होने के नाते ये बातें हो सकती हैं। लेकिन समय आने पर हमारे सभी लोग एकजुट होकर चुनौतियों का सामना करते हैं। समय का इंतजार कीजिए हमारे सभी नेता एकजुट होकर भाजपा के मंसूबों को नाकाम कर देंगे।
0. कांग्रेस के कई नेताओं की महत्वाकांक्षाएं टकराने की बाते सामने आती रहती हैं, कुछ लोग अभी से अपने आप को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट करने लगे हैं?
00. कोई भी व्यक्ति हमारी पार्टी में दावा नहीं कर सकता कि मैं सीएम बनूंगा। पहले चुनाव होता है, लोकतंत्र में चुनकर आए विधायक और हाईकमान के प्रतिनिधि बैठकर इसका फैसला करते हैं। हमारे यहां ऐसी परंपरा नहीं है। हमारे यहां भाजपा जैसा नहीं है कि सब अपने को सीएम बताने लगें। रही बात महत्वाकांक्षा की तो मैं इसे गलत नहीं मानता। लेकिन महत्वाकांक्षा अपनी जगह है और हाईकमान के निर्देश का पालन करना अपनी जगह। और जब हाईकमान का निर्देश मिलता है तो सभी लोग एकजुट होकर काम करते हैं।
0. आप मंदिरहसौद सीट से पांच बार विधायक चुने गए हैं। यहीं से चुनकर अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे हैं। आपकी सीट परिसीमन में विलोपित हो रही है। अब कौन सा नया इलाका आपके सामने है? वहां अपनी क्या उपलब्धि लेकर जनता के बीच जाएंगे?
00 मंदिरहसौद विधानसभा सीट पर मेरा यह पांचवां कार्यकाल है। मेरी सेवा भावना और विकास कार्यों की वजह से ही मुझे वहां की जनता ने बार-बार मौका दिया है। लोगों को पता है कि मैं अपने क्षेत्र के काम के लिए चौबीसों घंटे तैयार रहता हूं। मंदिरहसौद में एजुकेशन में सबसे अधिक काम हुआ है। 77 गांवों में 16 हायर सेकेंडरी स्कूल हैं। कोई ऐसा गांव नहीं है जहां सड़क, बिजली, प्राथमिक स्वास्थ्य का इंतजाम न हो। मेरे विधानसभा क्षेत्र में तीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। पीने के पानी के मामले में कोई ऐसा गांव नहीं है जहां 20 हैंडपंप से कम हों। जिस भी नये विधानसभा क्षेत्र की जिम्मेदारी पार्टी मुझे देगी वहां निर्वाचित होने के बाद जनता की आशाओं के अनुरूप मैं काम करूंगा।
0. आपकी पसंद वाली कोई विधानसभा सीट है क्या?
00. पसंद का सवाल नहीं है। चार विधानसभा सीटें बनी हैं, पार्टी उनमें से जो भी सीट देगी मैं उस पर चुनाव लड़ूंगा।
0. भाजपा की तीन रुपए चावल योजना के बाद आपकी पार्टी ने भी सत्ता में आने पर 2 रुपए किलो चावल देने की घोषणा की है। भाजपा के लोग कहते हैं कि अगर कांग्रेस का ऐसा मन है तो वह दूसरे रायों में जहां कांग्रेस की सरकार है वहां इसे क्यों नहीं शुरू करती?
00. हमारे महामंत्री वी नारायण सामी ने कहा है कि हमारी सरकार बनेगी तो हम दो रुपए किलो में चावल देंगे। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि हम लोगों को भरपेट भोजन देंगे। भाजपा को अपने स्टेट की बात और तुलना करनी चाहिए। दूसरे स्टेट में भाजपा की सरकारें भी हैं, वे वहां इसे क्यों नहीं लागू कर रहे हैं। आवश्यकता पड़ने पर इस पर भी विचार किया जाएगा।
0. आप कह रहे हैं कि भाजपा में बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार है, लेकिन जनता को तो विकास के काम होते हुए दिख रहे हैं?
00. आप कहीं से भी वैल्यूएशन करा लीजिए जो एस्टीमेट बन रहे हैं वह दस गुना यादा कीमत के हैं। सामान्य से ऊंची कीमत पर ठेके दिए जा रहे हैं। लोवेस्ट रेट आता है तो उसे कैंसिल कर देते हैं, अपने-अपने लोगों को देने के लिए फिर से बढ़ी कीमत पर टेंडर बुलाए जाते हैं। जनता सब समझती है, उसे पता है कि कौन काम कितने का है, उसे कितने में किया गया है। काम किस गुणवत्ता का है। जनता को नासमझ समझने वालों के होश चुनाव के बाद उड़ जाते हैं।
0. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की जो छवि है उसका भाजपा को कितना फायदा मिलेगा?
00. जनता जानती है कि मुख्यमंत्री के अकेले के बस की बात नहीं है। मुख्यमंत्री भले आदमी हैं इसको हम मान सकते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री की टीम करप्ट है। भाजपा के दूसरे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। मुख्यमंत्री का कोई नियंत्रण भाजपा के लोगों और अपनी टीम पर नहीं है।
0. नक्सलवाद के मुद्दे पर आपका क्या कहना है?
00. नक्सलवाद के मुद्दे पर हमारी पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा को बोलने का अधिकार दिया है। इसलिए इस पर जो भी कहना होगा वे ही कहेंगे।
0. बिजली विखंडन के मामले में कर्मचारियों का कहना है कि यहां के स्थानीय नेता इसका विरोध नहीं कर रहे हैं। आपकी पार्टी का क्या कहना है?
00. बिजली बोर्ड के अधिकारियों ने नेता प्रतिपक्ष को इस संबंध में ज्ञापन दिया था। हमारी पार्टी ने तो कहा था कि सरकार संकल्प ले आए हम लोग उसका समर्थन करेंगे। संकल्प लाना सरकार का दायित्व है। सरकार क्या करना चाहती है समझ में नहीं आता।
0. चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को किस-किस चीज का फायदा मिल सकता है?
00. भाजपा को नकारात्मक वोट के चलते सबसे यादा नुकसान होगा और कांग्रेस को इसी का फायदा मिलेगा।
0. महिलाओं को चुनाव में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने पर आपकी पार्टी का क्या स्टैंड है? भाजपा ने अपने राष्ट्रीय संगठन में महिलाओं को बड़ी संख्या में स्थान देकर इसकी शुरुआत कर दी है।
00. सबसे पहले कांग्रेस सरकार ने महिलाओं को पंचायत के चुनाव में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी। भाजपा ने जो महिलाओं को स्थान दिया है वह अपने निजी संगठन में दिया है। वे वहां 100 प्रतिशत महिलाओं को स्थान दे सकते हैं। विधानसभा और लोकसभा में आरक्षण दे कर दिखाएं तो उनकी कथनी-करनी एक होगी।
0. अभी जो वेदांती का मामला सामने आया है उससे आपको नहीं लगता कि भाजपा चुनाव के समय गुजरात पैटर्न इस्तेमाल कर सकती है?
00. छत्तीसगढ़ सात्विक राय है। यहां सांप्रदायिकता जैसी जनता में कोई भावना नहीं है और न ही इसका जनता पर कोई असर होता है। लोगों में आपसी भाईचारा, सदभाव है। इसलिए चाहे वेदांतीजी हों या दूसरे लोग इसका कोई असर होने वाला नहीं है। भाजपा धार्मिक उन्माद उभारने का हर जगह प्रयास करती है, लेकिन छत्तीसगढ़ की जनता समझदार है। इसलिए ये यहां सफल नहीं होंगे।
0. राहुल गांधी का दौरा अभी छत्तीसगढ़ में हो रहा है, उसका कांग्रेस को क्या फायदा मिलेगा?
00. राहुल गांधी जी का दौरा प्रदेश के विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों में हो रहा है, जिसमें वे समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। उसका राय और पार्टी को बहुत फायदा मिलने वाला है। राहुल जी का जो आकर्षण है उससे युवा तबके पर विशेष प्रभाव पड़ेगा और उमंग का संचार होगा। उनके मन में आदिवासियों विशेषकर महिलाओं के लिए जो सम्मान है यही उनकी पहचान है। बगैर पूर्व सूचना दिए वे लोगों से मिलते हैं और जानने का प्रयास करते हैं कि जनता क्या सोचती है, क्या चाहती है, उसका शोषण तो नहीं हो रहा, उसके साथ अन्याय तो नही हो रहा।
0. साढ़े चार साल के भाजपा के शासनकाल में आप छत्तीसगढ़ की संस्कृति को कहां पाते हैं?
00. भाजपा के शासनकाल में संस्कृति के बारे में किए गए कार्यों की प्रगति मुझे डिस्प्ले बोर्ड और विज्ञापनों में ही दिखाई पड़ती है। यही हाल पर्यटन का भी है। हर योजना के झूठे प्रचार और आंकड़ों के लिए करोड़ों रुपए पब्लिसिटी पर बर्बाद कर दिए गए। कुछ लोगों का चेहरा बोर्डों में बार-बार देखकर जनता परेशान हो गई है। उन बोर्डों पर जनता नजर तक डालना नहीं चाहती। इन्होंने यहां के कल्चर का सत्यानाश किया है। छत्तीसगढ़ियों की हालत खस्ता है, बाहरी लोगों को बुला-बुलाकर उन्हें मालामाल किया जा रहा है। इस पार्टी ने संस्कृति के नाम पर सिर्फ धार्मिक उन्माद को उभारने का काम किया है। धार्मिक होना एक अच्छी बात है हम इससे इंकार नहीं करते। लेकिन धर्मान्ध होना खतरनाक है। कट्टरपंथी चाहे हिन्दू हों या मुसलमान सभी देश के लिए घातक हैं। मैं एक ही बात कहना चाहता हूं कि हम सबकी संस्कृति भाईचारे में समाहित है।
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"डा. रमन की छवि अच्छी मगर सरकार की नही"

( रायपुर, 23 अप्रैल 2008, दोपहर 12 बजे)
0. आगामी विधानसभा चुनाव में आपकी पार्टी क्या-क्या मुद्दे लेकर जनता के बीच जाएगी ?
00. किसी भी चुनाव में दो बातें होती हैं। एक तो हमने क्या किया और दूसरी विपक्ष की विफलताएं। हमने क्या किया में हमारे पास राय गठन के बाद तीन साल की कांग्रेस सरकार का कामकाज हमारे पास है। जिसमें गुणवत्ता, पारदर्शिता के साथ वाजिब कीमत में विकास के अनेकों काम हुए। कांग्रेस सरकार की हर नीति समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने को लेकर बनाई गई थी। लोगों को उनके गांव में ही रोजगार मिले इसके लिए हर जगह राहत कार्य खोले गए थे। आज भी दौरे के समय ग्रामीण कहते हैं कि जोगी के राज में उनके घर में 2-3 क्विंटल चावल रहता था। हर क्षेत्र में विकास का काम हुआ था। उसके उलट भाजपा सरकार में भी विकास के कार्य हो रहे हैं, क्योंकि केंद्र से इस समय 10 हजार करोड़ रुए से अधिक पैसा प्रतिवर्ष पैसा आ रहा है। लेकिन यहां हर काम में भ्रष्टाचार हो रहा है। एक तो एक रुपए का काम यह सरकार चार रुपए में कर रही है। ऊपर से किसी काम में गुणवत्ता और पारदर्शिता नही है। सारे काम भाजपा के लोगों को नियम-कानून को ताक में रखकर दिए जा रहे हैं। पूरा प्रदेश जानता है कि जोगी के समय गिरौदपुरी में कुतुबमीनार से उंचा जैतखाम बनाने की घोषणा की गई थी। इसके लिए बजट में 10-12 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया गया था। तीन साल तक सोए रहने के बाद चुनाव नजदीक आने पर इनके ऊपर दबाव बढ़ा। सरकार को सतनामी समाज और अनुसुचित जाति की याद आई। इन्होंने भी 17 करोड़ रुपए में जैतखाम बनाने की घोषणा की, इसके लिए गुपचुप तरीके से टेंडर बुलाए। तीन में से दो टेंडर को डिसक्वालीफाई कर दिया गया और रातोंरात एक टेंडर की राशि 17 करोड़ से बढ़ाकर 52.5 करोड़ कर दी। जबकि नियमत: सिंगल टेंडर को काम नहीं दिया जा सकता। काम देना तो छोड़िए इन्होंने रकम भी बढ़ा दी। एनयूटी में भी यही किया गया 1500 किमी की सड़क बनाने के लिए पहले 7-8 हजार करोड़ का बजट रखा गया था उसे रातोंरात बढ़ाकर 17 हजार करोड़ कर दिया गया। विधानसभा में जब हमारी पार्टी ने इस मुद्दे को उठाया तो मंत्री का जवाब था कि टंकण की त्रृटि की वजह से 7 से 17 हजार करोड़ रुपए हो गया। जबकि10 हजार करोड़ रुपए के यादा का एग्रीमेंट कर लिया गया और 15 सौ किमी से उसे बढाकर 25 सौ किमी कर दिया गया। तब यह टंकण त्रृटि कैसे हो सकता है। लेकिन सरकार ने विधानसभा में टंकण त्रृटि बताकर सिे सुधार लिया। इस तरह यह सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त है। गांव, गरीब, किसान की बात करने वाली भाजपा सरकार में किसी की सुनवाई नही है। केंद्र सरकार की रोजगार गारंटी योजना लागू होने से पहले बताएं कि कहां किस विधानसभा और किस ग्राम पंचायत में मजदूरों के लिए काम शुरू किया गया। मजदूरों को बंद लारी में भरकर भाजपा नेता पलायन करवा रहे हैं। किसानों को पानी, खाद के लिए भटकना पड़ रहा है। जिस प्रदेश का श्रम बिक रहा है, जिस प्रदेश की अस्मत बिक रही है, सौ से अधिक लड़किया सरगुजा से गायब हो गई, हमने विधानसभा में सवाल पूछा तो मंत्री कहते हैं कि यह तो होते रहता है। माइनिंग का अधिकार फर्जी कंपनियों को बेचा गया है और उन्हें बचाने का उपाय यह सरकार कर रही है। जो सरकार जिस प्रदेश का राजस्व, अस्मिता बेच जा रही है उसे सत्ता में एक दिन भी रहने का हक नही है। हम इन्हीं सब मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएंगे।
0. आप बोल रहे हैं कि हर विकास के काम में केंद्र के पैसे का दुरूपयोग और भ्रष्टाचार हो रहा है, लेकिन जनता को तो बहुत सारे विकास कार्य होते दिख रहे हैं। जनता को यह कैसे समझाएंगे?
00. देखिए अगर केंद्र से एक हजार करोड़ रुपए सर्वशिक्षा अभियान के लिए आ रहे हैं तो कुछ काम तो दिखोगा ही। सड़क के लिए एक हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं तो कुछ काम तो दिखेगा ही। लेकिन जनता देख रही हैं कि सड़कों की गुणवत्ता कैसी है। ठेकेदार कौन है, सब भाजपा के हैं। कितने यादा कीमत पर सड़क बनाई जा रही है। केंद्र से 10.5 हजार करोड़ का बजट इस साल दिया गया है। उसे इन्हें खच4 करना है। इसके लिए काम तो करना ही पड़ेगा। इससे विकास भी दिखेगा, लेकिन इसमें जो भ्रष्टाचार किया जा रहा है ुसे जनता देख, जान रही है। पूरी सरकार अधिकारी चला रहे हैं, ये उन्हें कस नहीं सकते क्योंकि उन्हीं के माध्यम से ये सारे भ्रष्टाचार कर रहे हैं। ये दबाव कैसे डालेंगे। अधिकारियों के सामने इनकी गरदन झुकी रहती है। जनता को सब पता है।
0. आप व्यक्तिगत रूप से पलायन का मुद्दा विधानसभा और अन्य मंचों पर लगातार उठाते रहे हैं। भाजपा सरकार को इसमें कहां खड़ा पाते हैं?
00. केंद्र की रोजगार गारंटी योजना एक ऐसा माध्यम है कि अगर इसका सफल क्रियांवयन हो तो किसी भी गांव से किसी भी घर से पलायन नहीं होगा। पलायन का मतलब सिर्फ लोगों का पैसे के लिए बाहर जाना नही हैं। बल्कि उसके साथ उसका पूरा परिवार, महिला, जवान बच्चे, बच्चिया सब बाहर जाते हैं। जहां पैसे के साथ ही बाहर इनका शारीरिक और मानसिक शोषण तो होता ही है। इनकी अस्मत का भी शोषण होता है। छत्तीसगढ़ी अस्मिता का शोषण होता है। रोजगार गारंटी में कम से कम 100 दिन का काम दिए जाने की बात कही गई है।अधिकतम में आपको 365 दिन तक काम दिया जा सकता है। लेकिन हमारे यहां राय शासन उन कामों को खोल नहीं रही है। जितने रजिस्ट्रेशन हो रहे हैं उन्हें काम नहीं दिया आड़ लगाया जा रहा कि जहां से काम मांगा जाएगा वहां काम खोला जाएगा। जबकि हर एक ब्लाक और ग्राम पंचायत से 5-10 काम का प्रस्ताव जमा है। लेकिन सरकार कहती है कि बेरोजगार कलेक्टर को पत्र लिखकर काम मागेगा तो काम खोला जाएगा। अब हमारे यहां के गरीब मजदूर जिनका की पंजीयन हुआ है उन्हें न तो इतनी जानकारी है और न समझ है कि वह कलेक्टर पत्र लिखे। अब आप कहते हैं कि आपके यहां से काम मांगा नहीं गया इसलिए 100 दिन का मुआवजा नहीं देंगे। जबकि ग्राम पंचायतों के माध्यम से काम मांगे गए हैं। यह सरासर अन्याय है। इसी के चलते लोग पलायन करते हैं, आखिर गरीब परिवार को दो जून खाने के लिए तो चाहिए ही? फिर उनका बंधन-शोषण होता है। इसे तो हम जानते हैं। मैने अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में कम से कम 20 टीमें भेजकर जम्मू-कश्मीर, कलकत्ता, यूपी, नागपुर, महाराष्ट्र आदि से लोगों को छुड़ाया। एक-एक जगह से 20-40 लोगों को छुड़ाया गया। कोई जानबुझकर अपना शोषण कराने थोड़ी जाएगा। अगर आपको अपने घर में 500 रुपए का काम मिलेगा तो आप बाहर 2000 हजार का काम करने नहीं जाएंगे। यहां सरकार जानबूझकर काम नहीं खोल रही है। जबकि केंद्र से पूरा पैसा मिल रहा है। रोजगार में परावधान है कि हर हफ्ते काम का भुगतान किया जाएगा। मैं पूरी चुनौती से कहता हूं कि सभी जगह लोगों को 2-3 महीने हो गए हैं काम किए हुए किसी को भुगतान नहीं मिला है। मैंने प्रमाण के साथ कलेक्टर, प्रभारी मंत्री, सीओ जिला पंचायत को इस बारे में लिखा है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। अब जब भुगतान नहीं होगा तो वैल्युवेशन नहीं होगा तब तक काम की समाप्ति नहीं घोषित की जा सकती और जब तक काम की समाप्ति नहीं होगी, नया काम नहीं खोला नहीं जा सकता। इसे जानबूझकर भाजपा कर रही है। क्योंकि उसे डर है कि केंद्र सरकार की इस योजना का फायदा अगर जनता को मिला तो उसका परिणाम चुनाव में उलटा हो सकता है। भ्रष्टाचार के लिए ये लोग बोगस मस्टररोल भरा जा रहा है, इसे मैं दिखा सकता हूं। इसमें मशीनों और ठेकेदारी प्रथा से काम नहीं करवाया जा सकता, लेकिन मैं दिखा सकता हूं कि कहां-कहां यह हो रहा है। दस लाख के काम के लिए 30-30 लाख का एस्टीमेटबनाया गया है। बचे 20 लाख तो भ्रष्टाचार में ही जाएगा ना।
0. कांग्रेस में गुटबाजी की बात सामने आती रहती हैं। इसका चुनाव में क्या प्रभाव पड़ सकता है?
00. कांग्रेस बहुत बड़ा परिवार है। बड़े परिवार में मतविभिन्नताएं तो रहती ही हैं। कांग्रेस में मनभेद नही है यहां मतभेद है। चुनाव में वोट जनता को देना है और वह सोनिया जी का काम देख रही है, केंद्र की यूपीए सरकार का काम देख रही है, साथ ही राय सरकार का काम भी देख रही है। वह आपना आंकलन कर चुकी है क्योंकि वह भाजपा सरकार की अकर्मण्यता, निष्क्रियता,भ्रष्टाचार देख रही है। कांग्रेस में थोड़ा बहुत वादविवाद है, मतविभिन्नता है इससे जनता को फर्क नहीं पड़ता वह अपना मन बना चुकी है।
0. डा. रमन की जो छवि है, उसका चुनाव में भाजपा को कोई लाभ मिल सकता है क्या ?
00. डा. रमन की व्यक्तिगत छबि बहुत अच्छी है। सहज, सरल आदमी हैं। राजनीति से अलग हटकर काम करने की सोच रखते हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से उनकी इस स्वभाव का प्रशंसक हूं। पर पांच साल के कार्यकाल में जनता को क्या मिला? गरीब को क्या मिला? चुनाव में जनता इस बात का आंकलन करती है। उसे डा. रमन की छबि से कोई लेना-देना नही है। आज जनता यह देखती है कि उसके गांव में कितनी सड़क बनी, सिंचाई की क्या व्यवस्था हुई, राशन दुकान में सामान मिल रहा है कि नहीं। वह किसी का व्यक्तित्व देखकर वोट नहीं देती।
0. अभी जो वेदांती वाला मामला सामने आया है, उससे क्या नहीं लगता कि भाजपा गुजरात पैटर्न यहां लागू करना चाहती है?
00. निश्चित रूप से वह ऐसा प्रयास कर रही है, वह धार्मिक उन्माद उभारना चाहती है। जो कि छत्तीसगढ़ की फिजा और सदभावना के लिए बहुत गलत होगा। राजिम जो कुंभ का मेला एक धार्मिक मेला है। वह न किसी पार्टी का है और न किसी सरकार का। सरकार की जिम्मेदारी वहां व्यवस्था की है। उसे इन्होंने भाजपा का मंच बना दिया। छत्तीसगढ़ में जो प्रचलित धर्म है उसमें बाबा घासीदास, गुरू कबीरदास आदि धर्मों के बहुत सारे अनुयायी हैं। वहां सिर्फ एक धर्म और भाजपा से जुड़े धर्माचार्यों को ही बुलाया गया। वेदांती तो शुध्द रूप से भाजपाई हैं। जिन्हें रिश्वत के मामले में हटाया गया। वे ऐसे लोगों को बुला रहे हैं जिन्हें शर्म के मारे कहीं आना-जाना नहीं चाहिए और ऐसे लोग मंच से नैतिकता की बात करते हैं।हालांकि छत्तीसगढ़ की जो संस्कृति है उसमें इसे कहीं से भी प्रश्रय नहीं मिलता है। जनता के सामने भाजपा का यह प्रयास खुल गया है और उसे बहुत निंदनीय करार दिया है। इसका खामियाजा भाजपा को चुनाव में पता चलेगा। गुजरात जैसा पैटर्न यहां नहीं चल सकता।
0. आप कसडोल के विधायक हैं। अगले चुनाव में कसडोल की जनता के बीच अपनी क्या उपलब्धि लेकर जाएंगे? साढ़े चार साल के कार्यकाल में अपनी क्या उपलब्धि मानते हैं? लोगों कहते हैं राजकमल बड़े आदमी हैं, जमीन के व्यापारी हैं, जनता के लिए समय कैसे निकालते हैं?
00. मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि कसडोल की जनता से मिले भरपूर प्यार, सहयोग, आर्शीवाद को मानता हूं। मैंने अपनी विधानसभा के सभी 325 गांवों में जाने का प्रयास किया। हर गांव में मैं दो से लेकर दस-दस बार तक जा चुका हूं। मेरा प्रायस रहता है कि सभी से लोगों से मिलूं। रही बात कार्यों की तो एक विधायक का जो अधिकार और दायित्व होता है उसे मैंने पूरा निभाने का प्रयास किया। अपने इलाके में केंद्र की सभी योजनाओं को लागू करवाने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाया। रही बात बड़े आदमी की तो मैंने 15 साल से व्यापार छोड़ दिया है, मैंने 7-8 साल से कोी जमीन नहीं खरीदी है। मैं अपना पूरा समय समाजसेवा और अपने क्षेत्र की जनता को देता हूं। लोगों को शहर में मेरी जमीन देखकर ऐसा लगता है, लेकनि वह मेरी पुश्तैनी जमीन है। उसकी हिफाजत तो मैं करूंगा ही। मैंने जब तक धंधे में सक्रिय रहा तब तक कोई अनैतिक काम करके और गरीब का शोषण करके धन नहीं कमाया। कसडोल की जनता को भी पहले लगा था कि सिंघानिया जी बड़े आदमी हैं, चुनाव जीतने के बाद लौटकर आएंगे की नहीं। अगले चुनाव में मेरा काम जनता बताएगी। मेरी उपलब्धियों में कसडोल में सौ बिस्तर का अस्पताल, प्रत्येक वर्ष करीब सौ करोड़ रुपए की सड़कों का निर्माण, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, स्कूलों की बिल्डिंग समेत लगभग सभी विभागों से पूरा काम करवाया। मैं दावे से बोल सकता हूं कि जितना एक भाजपा का विधायक अपने क्षेत्र में काम करवाया होगा मैंने उससे यादा काम करवाया है। हालांकि भाजपा सरकार ने काम रोकने और पेंडिंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन मैं अपने व्यक्तिगत संबंधों और काम के पीछे पड़कर उसे पूरा करवाया।
0. भाजपा शासन में छत्तीसगढ़ की संस्कृति के लिए क्या काम हुए हैं? छ्तीसगढ़िया के साथ क्या दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है?
00. संस्कृति और पर्यटन में काम तो हो रहा है, लेकिन भ्रष्टाचार यहां भी हावी है। जहां तक छत्तीसगढ़िया की स्थिति की बात है, मैंने 15 साल पहले इस बात को उठाया था कि यहां जो उद्योग या संस्था हैं उनमें स्थानीय लोगों को नौकरी देने का प्रावधान होना चाहिए। रही बात संस्कृति रक्षा की तो जनता ने राजिम मेले में देख लिया है। भाजपा शासन में छत्तीसगढ़ियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा इसमें कोई शक नही है।
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"पिछला चुनाव कांग्रेस अपनी गलतियों से हारी"
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डा. चरणदास महंत का मानना है कि पिछला चुनाव कांग्रेस अपनी गलतियों से हारी थी। इस बार अगर वह मिलकर लड़ी तो अगली सरकार उसी की बनेगी। सोनिया गांधी के नेतृत्व में उन्हें पार्टी एक होती दिख भी रही है। वे बताते हैं- हमारे किसी के मन में मुख्यमंत्री बनने का लालच नहीं है। मैंने और विशेषकर कर्मा जी ने एआईसीसी की मीटिंग में हमारे वरिष्ठ नेताओं को साफतौर पर कह दिया है कि हमको आप काम करने दीजिए। सरकार हम बनाकर आपको दे रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने की हमारी कोई मंशा नहीं है। आप जिसको भी चाहें मुख्यमंत्री बनाएं हमारा इसमें कोई टकराव नहीं है। डा. महंत को लगता है कि भाजपा ने घोषणापत्र में जो वादे किए थे वे पूरे नहीं हुए। इससे जनता नाराज है और इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा। वे छत्तीसगढ में गुजरात दोहराए जाने की गुंजाइश नहीं देखते। उन्हें लगता है कि यहां की जमीन सांप्रदायिकता को बर्दाश्त नहीं करती। राज्य में आम छत्तीसगढ़िया की स्थिति उन्हें पीड़ादायक लगती है। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़िया को दोयम दर्जा दिया गया है, उसके आगे बढ़ने की संभावनाएं नहीं हैं। पिछली सरकार के समय जरूर स्थितियां अलग थीं। आगामी चुनाव की संभावनाओं पर नेशनल लुक के लिए बबलू तिवारी ने उनसे चर्चा की। पेश हैं उसके प्रमुख अंश-
0- आनेवाला विधानसभा चुनाव किन मुद्दों पर लड़ा जाएगा ?
00- हम लोग जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ेंगे उसमें पहला होगा कि भाजपा ने अपने घोषणापत्र में जनता से जो वादा किया था उसका 90 प्रतिशत पालन नहीं किया। विकास के नाम पर भाजपा ने पूरे प्रदेश में भ्रष्टाचार को बढ़ाया है। आज उनका हर सरपंच और कार्यकर्ता भ्रष्टाचार की चपेट में है तथा विकास के नाम पर मिलने वाले पैसे का आधा खुद खा रहा है। हमारे पास हमारी केंद्र की यूपीए सरकार की उपलब्धियां हैं। किसानों का 60 हजार करोड़ रुपए की कर्जमाफी का मुद्दा लेकर जनता के पास जाएंगे। साथ ही हमने कहा है कि किसानों और गरीबों को दो रुपए में चावल देंगे, धान का मूल्य कुछ भी हो उस पर दो सौ रुपए बोनस देंगे, किसानों को सिंचाई के लिए बिजली का कनेक्शन मुफ्त में देंगे और प्रयास करेंगे कि छोटे और कृषि ऋण पर किसानों को ब्याज न देना पड़े। हमारा मुख्य उद्देश्य किसानों, ग्रामीणों, गांव के छोटे-छोटे बढ़ई, लोहार आदि को बढ़ावा देने का है।
0- आप कहते हैं कि भाजपा ने अपने घोषणापत्र का 90 प्रतिशत काम नहीं किया, लेकिन भाजपा के शासनकाल में विकास के कार्य तो होते दिख रहे हैं ..
00- भाजपा ने जो मूल घोषणाएं गरीबों-आदिवासियों के लिए की थीं जैसे गाय बांटने का वादा किया था, बेरोजगारी भत्ता बांटने की बात कही थी, किसानों के लिए जो कहा था उसे पूरा नहीं किया। भाजपा के प्रति ग्रामीणों और किसानों में रोष हम देख रहे हैं। वे इनके व्यवहार, रवैए और भ्रष्टाचार से आक्रोशित हैं। उस आक्रोश का कांग्रेस को निश्चित ही फायदा मिलेगा ऐसा मैं मानता हूं। मुझे विश्वास है कि इस सरकार के प्रति लोगों में जो निराशा है हमें उसका लाभ मिलेगा। हमे यह मालूम है कि भाजपा हमारी गल्तियों की वजह से जीती है। भाजपा को 1998 में 39 प्रतिशत वोट मिले थे और उसमें इन्हें 36 सीटें मिली थीं और अभी इन्होंने 39 प्रतिशत वोट में 50 सीटें जीतीं। इसके पीछे कांग्रेस के बिखराव की भूमिका थी। इसलिए हमारा पहला प्रयास कांग्रेस के बिखराव को समाप्त करना है जिसमें हम लगभग कामयाब हो रहे हैं और चुनाव के समय तक हम पूरी तरह से इस बिखराव को समाप्त करेंगे। कांग्रेस एकजुट होकर चुनाव लड़ेगी तो आनेवाली सरकार कांग्रेस की होगी।
0- राजनीति में महत्वाकांक्षाओं को किस तरह से देखते हैं? उनका टकराव ही तो कांग्रेस के बिखराव का कारण है...
00- महत्वाकांक्षाओं का टकराव तो राजनीति में होते ही रहता है। लेकिन आज की तारीख में सोनिया जी के निर्देश पर दिल्ली में जो बैठकें एआईसीसी में हुई हैं, उसमें सबने अपना मतभेद भुलाने का प्रयास किया है और हम लोग कांग्रेस के लिए सरकार बनाना चाहते हैं, सोनिया जी के लिए सरकार बनाना चाहते हैं। हमारे किसी के मन में मुख्यमंत्री बनने का लालच नहीं है। मैंने और विशेषकर कर्मा जी ने एआईसीसी की मीटिंग में हमारे वरिष्ठ नेताओं को साफतौर पर कह दिया है कि हमको आप काम करने दीजिए। सरकार हम बनाकर आपको दे रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने की हमारी कोई मंशा नहीं है। आप जिसको भी चाहें मुख्यमंत्री बनाएं हमारा इसमें कोई टकराव नहीं है।
0- दो रुपए किलो चावल की जो बात कांग्रेस कर रही है उसे कांग्रेस शासित रायों से क्यों नहीं शुरू किया जाता, यह सवाल विरोधी पूछ रहे हैं...
00- हमारा कांग्रेस शासित राय छत्तीसगढ़ से लगा हुआ आंध्र प्रदेश है। वहां हम दो रुपए किलो में चावल दे ही रहे हैं। ऐसा नहीं है कि भाजपा के तीन रुपए चावल की घोषणा के बाद हमने सोचा। मैं भाजपा से पूछना चाहूंगा कि उनकी किन-किन रायों में सरकार है और वे किन-किन रायों में तीन रुपए में चावल दे रहे हैं।
0- कांग्रेस गुजरात चुनाव परिणाम का किस तरह से विश्लेषण करती है? भाजपा उसे छत्तीसगढ़ में दोहराने का अगर प्रयास करती है तो ऐसी स्थिति में कांग्रेस क्या करेगी ?
00- गुजरात में भाजपा ने सांप्रदायिकता फैलाकर और लोगों को बांटकर चुनाव लड़ा था। छत्तीसगढ़ की जो जमीन है वह इन चीजों को सहन नहीं करती है। यहां वैसे हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई के बीच झगड़े नहीं हैं जैसे गुजरात में हैं। यहां लोगों में एका है, सामाजिक समरसता है इसलिए गुजरात का कोई प्रयोग यहां सफल नहीं हो पाएगा।
0- चुनावों में इतना ज्यादा खर्च क्या जरूरी है? इसका कोई विकल्प नहीं है क्या?
00- आजकल समाचारपत्रों, इलेक्ट्रानिक मीडिया का जमाना है और सब लोग चाहते हैं कि समाचारपत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिए चुनाव का प्रचार हो। इन कारणों से कुछ चुनाव खर्च तो बढ़ जाते हैं। फिर भी कांग्रेस पार्टी कम से कम खर्च में चुनाव लड़ते आई है और धन-बल का यहां यादा उपयोग नहीं रहा है।
0- रमन सरकार के कामकाज बारे में क्या कहना चाहेंगे?
00- मैं ऐसा मानता हूं कि रमन सरकार में जितने भी मंत्री बने हैं उनमें एकाध को छोड़कर किसी को भी अनुभव नहीं है। इसलिए राजकाज क्या होता है उनको समझ में नहीं आता है। इतने हल्के ढंग से किसी बात को कह जाते हैं जैसा कि अजय चंद्राकर जी ने कहा कि सरकार बच्चे पैदा नहीं करती। ये कोई छोटी-मोटी बात नही है कि एक सरकार का जिम्मेदार शिक्षामंत्री जिसकी प्राथमिक जिम्मेदारी लोगों को शिक्षित करने की है वो इस तरह की अनर्गल और अलोकतांत्रिक बात करे, जिसे दिमाग का दिवालियापन कहा जा सकता है। इस प्रकार के कई मंत्री हैं जिन्हें इस बात का होश ही नहीं है कि मुख्यमंत्री का, मंत्री का और सरकार का क्या दायित्व है। उन्होंने लालबत्ती ले ली, जितना पैसा आ रहा और जितनी व्यवस्था हो रही है सब भ्रष्टाचार में लगा रहे हैं मगर कर कुछ नहीं रहे हैं।
0- राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़िया की क्या स्थिति है और यहां की संस्कृति के साथ क्या हो रहा है?
00- राय बनने के बाद छत्तीसगढ़ियों की जो स्थिति है वह पूरी तरह से दोयम दर्जे की है। मैं इस बात को विस्तार से नहीं कहना चाहूंगा लेकिन यह सौ प्रतिशत कह सकता हूं कि राय बनने के बाद ं कांग्रेस सरकार में छत्तीसगढ़िया लोगों को आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा था पर उसके बाद जबसे रमन सरकार आई है तब से छत्तीसगढ़ का कोई मंत्री न तो पनप सका और न बढ़ सका है। यहां के मंत्रियों को दोयम दर्जे में रखा गया। छत्तीसगढ़ियों को दोयम दर्जे पर रखा गया। भाजपा सरकार में जो लोग बाहर से आकर छत्तीसगढ़ में काम और व्यापार कर रहे हैं उन्हीं के यहां पौ-बारह हुए हैं। मैं यह कह सकता हूं और इस बात को आगे भी कहूंगा। छत्तीसगढ़ में एक कहावत है कि पेट में भात और छाती में लात। छत्तीसगढ़ियों के सम्मान के साथ भाजपा ने खिलवाड़ किया, हमारे सम्मान को तवाो नहीं दी। छत्तीसगढ़ की जो परंपरा-संस्कृति रही है आपस में मिलना, भेंट करना। यहां संत कबीर, बाबा घासीदास की जो सामाजिक शिक्षा है और प्रेम का संदेश था जिसके कारण हम लोगों में आपस में एकता और प्रेम था उसे इन्होंने खत्म करने और तहस नहस करने का प्रयास किया है।
0- डा. रमन सिंह की छवि आगामी विधानसभा चुनाव में क्या प्रभाव डालेगी?
00- डा. रमन सिंह की छवि चुनाव में कोई प्रभाव नहीं डालेगी।आखिर सभी मंत्रियों के नेता वही हैं। जो भी भ्रष्टाचार हुआ है वे उसके बराबर के भागीदार हैं। भाजपा सरकार ने यहां के किसानों, गरीबों, ग्रामीणों और छत्तीसगढ़ियों के साथ जो भी अन्याय किया है उसके प्रथमत: जिम्मेदार डा. रमन हैं। मैं नहीं मानता कि उनकी सरलता वाली जो छवि है वह किसी काम आनेवाली है।
लेबल साक्षात्कार स्टोरी राजनीति, साक्षात्कार
"सलवा जुड़ूम के कारण पार्टी में अलग-थलग पड़ जाता हूं"
'बस्तर का शेर' कहे जाने वाले महेंद्र कर्मा नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे आंदोलन सलवा जुड़ूम के प्रबल समर्थक हैं। विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर होते हुए भी उन्होंने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में सरकार को सहयोग दिया जिसके कारण विरोधी उन्हें रमन सरकार के मंत्रियों में गिनते हैं। उनका मानना है कि आगामी चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनेगी जिसका लक्ष्य भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देना होगा। जनता को ऐसी सरकार चाहिए जिसमें अंतिम व्यक्ति तक की बात सुनी जाती हो, जो कांग्रेस में ही संभव है। उनके मुताबिक रमन सरकार के पास नक्सल मुद्दे पर कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है। राष्ट्रीय और प्रदेश के हित का मामला होने की वजह से वे इससे जुड़े हैं। अपने खुद के बारे में श्री कर्मा कहते हैं कि सत्ताधीश नेता राजधानी के वातानुकुलित कमरे में बैठकर नक्सलियों से लड़ने की बात करते हैं, जबकि मैं दंतेवाड़ा के नक्सल इलाकों में जाकर लोगों से नक्सलियों को उखाड़ फेंकने की बात करता हूं, हममें और इस सरकार में यही फर्क है। श्री कर्मा का मानना है कि प्रदेश कांग्रेस के भीतर गुटबाजी लगभग समाप्त हो चुकी है और जनता पर डॉ. रमन सिंह की अच्छी छबि का कोई असर नहीं होगा। जनता जानती है कि यहां पुरस्कार खरीदे गए हैं। 'नेशनल लुक' के लिए नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा से बबलू तिवारी ने लंबी चर्चा की। प्रस्तुत है चर्चा के मुख्य अंश-
0. आगामी विधानसभा चुनाव किन मुद्दों पर लड़ा जाएगा?
00. हमारी कांग्रेस पार्टी केंद्र की कांग्रेस सरकार द्वारा किसानों की कर्जमाफी, दो रुपए किलो में चावल देने की हमारी घोषणा को लेकर जनता के बीच जाएगी। प्रदेश स्तर पर हम किसानों और गांवों के छोटे उद्यमियों को ब्याज मुक्त ऋण देने पर विचार कर रहे हैं। भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन, लोगों को सामाजिक समानता देना हमारा मुख्य लक्ष्य होगा। बाकी भाजपा सरकार का कामकाज तो जनता के सामने है ही, इसलिए हमें अपनी बात समझाने में कोई मुश्किल नहीं जाएगी। जनता ने भाजपा का शासन देख लिया है और अब उसे समझ में आ चुका है कि कौन उनके हित की बात और काम करता है।
0. भाजपा को डा. रमन सिंह की छवि का क्या फायदा चुनाव में मिल सकता है ? भाजपा सरकार के कामकाज के बारे में क्या कहेंगे?
00. मुख्यमंत्री की छवि का भाजपा को कोई फायदा नहीं मिलने वाला। जनता को पिछले साढ़े चार साल के भाजपा शासन में समझ आ चुका है कि किसी की छवि से उसका कोई भला नहीं होना, उसे प्रशासनिक तंत्र पर मजबूत पकड़ वाली सरकार चाहिए, उसे गरीबों और ग्रामीणों के हित के लिए काम करने वाली सरकार चाहिए, उसे प्रदेश को विकास के रास्ते पर ले जाने वाली सरकार चाहिए, उसे ऐसी सरकार चाहिए जिसमें अंतिम व्यक्ति तक की बात सुनती हो, उसे भ्रष्टाचार मुक्त सरकार चाहिए, उसे सिर्फ पेट भरने के लिए सरकार नहीं चाहिए, उसे सामाजिक समानता चाहिए, छोटे तबकों को मुख्य धारा में लाने के लिए काम करने वाली सरकार चाहिए। इस सरकार का प्रशासनिक तंत्र पर कोई पकड़ नही है, ये सिर्फ भाजपाइयों के फायदे के लिए प्रशासन पर दबाव डालते हैं। हमने देखा है कि एक सरपंच के मामले में भाजपाइयों को खुश करने के लिए कैसे सरकार ने प्रशासनिक तंत्र पर दबाव डाला था। जिसमें भाजपा सरकार नाकामरही है। मुझे नहीं लगता कि किसी की व्यक्तिगत छवि का लाभ भाजपा को मिलेगा।
0. आप कह रहे हैं कि जनता कि उम्मीदों पर यह सरकार खरी नहीं उतरी है, जबकि मुख्यमंत्री को लगातार कोई न कोई पुरस्कार मिल रहा है ?
00. यही तो विडंबना है इस सरकार की। एक बार मुख्यमंत्री को सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री का पुरस्कार क्या मिला, वे पूरे कार्यकाल तक उसे बचाने में ही लगे रहे। इसके लिए न जाने कौन-कौन से तरीके आजमाए गए। कहीं से पुरस्कार खरीदा गया तो कहीं किसी संगठन को फायदा पहुंचाकर पुरस्कार प्राप्त किया गया। आखिर किसी मुख्यमंत्री को ऐसे पुरस्कार की जरूरत ही क्या है जो कि खरीदकर प्राप्त किया गया हो? उसका पुरस्कार तो जनता के लिए किए गए अच्छे कार्य और उसे लाभ पहुंचाकर मिलने वाला सम्मान होना चाहिए ।
0. नक्सलवाद के मुद्दे पर रमन सरकार को कहां खड़ा पाते हैं और अपने आप को भी ?
00. रमन सरकार के पास नक्सल मुद्दे पर कोई रणनीति नहीं है। राष्ट्रीय और प्रदेश के हित का मामला होने की वजह से मैं भी इससे जुड़ा हूं। अभी जो कामयाबी मिल रही है उसके पीछे जवानों और अफसरों का हौसला है, जिसे की यह सरकार लगातार कम कर रही है। इन्होंने जंगलों में सर्चिंग का काम बंद करा दिया है। इन्हें डर लगता है कि कहीं कोई बड़ी वारदात हो जाएगी तो इनके वोट बैंक पर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने चुनाव तक वोट की खातिर नक्सल अभियानों को बंद कर दिया है। ये राजधानी के वातानुकूलित कमरे में बैठकर नक्सलियों से लड़ने की बात करते हैं, जबकि महेंद्र कर्मा दंतेवाड़ा के नक्सल इलाके में जाकर लोगों से नक्सलियों को उखाड़ फेंकने की बात करता है, हममें और इस सरकार में यही फर्क है। सलवा जुड़ूम अभियान जिसे यह सरकार अपनी उपलब्धि बताकर श्रेय लेने की कोशिश करती है, उसे वहां की जनता ने शुरू किया। इसके पीछे सरकार का कोई रोल नहीं है। ये सिर्फ उसे पीछे से मदद कर रहे हैं। लेकिन हम सलवा जुड़ूम के साथ उनके इलाके में खड़े रहते हैं। मैं इस मुद्दे की वजह से अपनी पार्टी में कई जगह अलग-थलग पड़ जाता हूं, लेकिन मैं दंतेवाड़ा से आता हूं, जो कि घोर नक्सल प्रभावित है, इसलिए मैं जानता हूं कि नक्सलियों की वजह से वहां का आदिवासी और जनता पूरे देश की अपेक्षा कितनी पीछे चली जा रही है। लोगों की जिंदगी दूभर हो गई है। वहां की जनता इससे छुटकारा चाहती है, मैं दूसरों की अपेक्षा इस दर्द को ज्यादा अच्छे से महसूस करता हूं, यहीं कारण है कि मैं सलवा जूड़ूम के साथ अपनी अंतिम सांस तक खड़ा रहूंगा। चाहे इसके लिए मुझे कोई भी कुर्बानी क्यों न देनी पड़ी।
0. क्या राहत शिविरों में रहने वाले लोगों का इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में
किया जा सकता है ?
00. इस सरकार की जो रीति और नीति है उससे मुझे पूरी आशंका है कि
भाजपा प्रशासनिक और पुलिस द्वारा दबाव डालकर राहत शिविरों में रहने वाले लोगों को मतदान के समय प्रभावित कर सकती है। हालांकि कांग्रेस इसे रोकने का पूरा प्रयास करेगी। ये अलग बात है कि राहत शिविरों में रह रहे लोग भी इस सरकार की नीयत को पहचान चुके हैं।
0. जाति की राजनीति का छत्तीसगढ़ में क्या भविष्य है?
00. छत्तीसगढ़ इससे ऊपर उठ गया है। यहां जनता और राजनीतिज्ञों में इसके प्रति बड़ा स्पष्ट नजरिया है। मुझे नहीं लगता कि यहां ऐसी राजनीति सफल हो सकती है।
0. कांग्रेसी नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और गुटबाजी का भाजपा को क्या लाभ मिल सकता है? कुछ कांगेस नेता अपने को अगला मुख्यमंत्री बताने की कोशिश करने लगे हैं?
00. देखिए बड़ी और राष्ट्रीय पार्टियों में मुख्यमंत्री का फैसला हाईकमान करता है, किसी के यहां अपने आप को मुख्यमंत्री कहने से कुछ नहीं होता। जहां तक मेरी बात है, मैंने सोनिया जी को स्पष्ट कह दिया है कि आप हमें काम करने दीजिए, हम कांग्रेस की सरकार छत्तीसगढ़ में बनाकर देंगे फिर आप जिसे योग्य मानिएगा उसे मुख्यमंत्री बनाइएगा। हमारा इसमें कोई टकराव नहीं होगा। लेकिन पिछली बार की गल्तियों का दोहराव इस बार मत होने दीजिए। पार्टी किसी नेता की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर होती है। इस बार कांग्रेस पिछली बार की अपेक्षा और मजबूत हुई है। गुटबाजी लगभग समाप्त हो चुकी है। हम सब मिलकर इस बार चुनाव लड़ने जा रहे हैं।
0. क्या भाजपा गुजरात चुनाव की सीख यहां दोहरा सकती है?
00. दोहरा सकती नहीं, दोहराना शुरू कर दिया है, वेदांती का मामला इसी से जुड़ा हुआ है। चूंकि भाजपा धर्म की राजनीति ही करती रही है, इसलिए वह इससे पीछे नहीं हटने वाली। छत्तीसगढ़ की जनता बहुत समझदार है। यहां के लोगों में आपसी भाईचारा है, मिलनसार हैं। यहां कि संस्कृति भी इसकी इजाजत नहीं देती है। इसलिए भाजपा का यह तुरुप यहां नहीं चलने वाला है। हालांकि वह इसका प्रयोग करने की पूरी कोशिश कर रही है।
0. राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ी संस्कृति में क्या बदलाव हुए हैं, यह मजबूत हुई है या कमजोर?
00. राज्य बनने के बाद तो नहीं लेकिन जब से भाजपा सत्ता में आई है तब से इसे नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। यह मड़ई-मेलों का प्रदेश है। यहां कि एक लोक संस्कृति है। बस्तर के रहन सहन और संस्कृति को जानने और सीखने के लिए पूरा विश्व लगा हुआ है। विदेशी विश्वविद्यालयों के छात्र इस कल्चर का अध्ययन करने के लिए यहां आते हैं। लेकिन भाजपा सरकार इसे तहस नहस करने में लगी है। धर्म की राजनीति करने वाली भाजपा सरकार वेद-पुराणों से परे काम कर रही है। जिस धर्म संस्कृति में कुंभ 12 साल और अर्धकुंभ 6 साल में होते हैं और जिसे सदियों से यह देश मानता रहा है उसे ये लोग हर साल मना रहे हैं। जो लोग भारतीय संस्कृति से खेल सकते हैं, वे छत्तीसगढ़ी संस्कृति से तो खेलेंगे ही। इनका हर एक धार्मिक आयोजन वोट बैंक के लिए होता है। धर्म- संस्कृति से इनका कोई लेना-देना नही है।
0. कल दिग्विजय सिंह ने बयान दिया है कि उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डा. महंत से कहा है कि वे महेंद्र कर्मा को सलवा जूड़ूम से अलग होने के लिए मनाएं?
00. मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है, मैं इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकता।
0. प्रदेश में इतने एमओयू हुए, इससे आपको नहीं लगता कि प्रदेश में विकास का काम हो रहा है?
00. अरे भाई एमओयू करना अलग बात है, विकास होना अलग बात। आप कहते हैं कि हमने करोड़ों का एमओयू किया। एमओयू एक कमरे के भीतर होता है। आप किसके साथ, कहां एमओयू करते हैं इसे आप छुपा सकते हैं और जनता को कुछ भी बता सकते हैं, लेकिन एमओयू का क्रियांवयन नहीं छुपा सकते वह तो फील्ड में होना है। आप कहते तो हैं कि करोड़ों का एमओयू हुआ पर उसका क्रियांवयन कहां हुआ। मैं बस्तर के बारे में बता सकता हूं कि अभी तक वहां एस्सार और टाटा ने कोई भी काम शुरू नहीं किया है। जब तक क्रियांवयन नहीं होगा तब तक विकास कैसे हो सकता है। एमओयू भर कर लेने से विकास हो गया। कोई अगर ऐसा सोचता है तो हमें कोई दिक्कत नहीं है। जनता सब देख रही है, सब जान रही है।
0. आपको क्या लगता है भाजपा के तीन रुपए किलो चावल का उसे कोई प्रतिफल मिलेगा? सरकार की माने तो जनता बहुत खुश है?
00. देखिए यह बात सत्ता में बैठे लोगों को कभी भी समझ में नहीं आती है। उसे जनता खुश ही दीखती है। इससे पहले प्रदेश में हमारी सरकार थी। किसी क्या मालूम था कि सरगुजा से लेकर बस्तर तक जनता अपना फैसला ले चुकी है? इससे पहले केंद्र में एनडीए की सरकार थी उसे भी इंडिया शाइन, भारत उदय दिखने लगा था, लेकिन क्या किसी को मालूम था कि देश की जनता कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपना फैसला ले चुकी है ? जनता मतदान के समय अपना फैसला सुनाती है। वह सरकार के कार्यकाल के दौरान सारी गतिविधियों को देखते रहती है और अपना फैसला सुरक्षित रखते जाती है। जनता ने भाजपा की कथनी और करनी में फर्क देखा है। उसने देखा है कि किस संकल्प और वादों के साथ भाजपा सत्ता में आई और कैसे उसे अलग रख दिया गया। कर्जमाफी, बेरोजगारों को भत्ता देने का वादा अभी जनता भूली नहीं है। मैं आजतक किसी कर्जमाफी वाले किसान-ग्रामीण से नहीं मिल पाया। अपने हर सम्मेलन में ऐसे लोगों को ढूढंता हूं जिसे कर्जमाफी मिली हो। अगर भाजपा को ऐसा लगता है तो यह हमारे लिए अच्छा ही है।
लेबल साक्षात्कार स्टोरी राजनीति, साक्षात्कार
" नेता-अफसर भी अंधविश्वास का साथ देते हैं "

( रायपुर, 9 फरवरी 2008, रात 10.30 बजे )
अंधविश्वास दूर करने और लोगों को चमत्कारों की असलियत बताने में बरसों से लगे डा. दिनेश मिश्रा को लगता है कि टोनही प्रताड़ना के खिलाफ बने कानून को और अधिक सख्त बनाने की जरूरत है। दोषियों पर जुर्माने की रकम बढ़ाई जानी चाहिए और वह रकम पीड़ित महिला को दी जानी चाहिए। वे मानते हैं कि गांव गांव में जागरूकता फैलाने के इस सफर में उन्हें अभी मीलों चलना है लेकिन इस बात का संतोष है कि लोग उनसे जुड़ते जा रहे हैं और पहले से कहीं अधिक सूचनाएं उन तक पहुंच रही हैं। उन्हें इस बात का दुख है कि पढ़े लिखे लोगों में से भी बहुत से लोग अंधविश्वासी हैं। बहुत से नेता-अफसर भी सार्वजनिक तौर पर अंधविश्वास के साथ खड़े नजर आते हैं। कुछ वोट बैंक के कारण इनके खिलाफ बोलने से बचते हैं। अंधविश्वास से लड़ने के लिए शिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार को डा. मिश्र महत्वपूर्ण मानते हैं। मुख्यमंत्री को वे हर जिले में एक एक मेडिकल कॉलेज खोलने का सुझाव भी दे चुके हैं। नेशनल लुक के लिए बबलू तिवारी ने उनसे अंधविश्वास और विज्ञान को लेकर ढेर सारे सवालों के साथ लंबी चर्चा की।
कैसे शुरू हुआ यह सफर...
बात शायद 1992 के आसपास की है। शहर के एक युवा डाक्टर ने अपनी नेत्र चिकित्सा की नई-नई क्लीनिक खोली थी। व्यवसाय के रूप में उसने डाक्टरी तो शुरू कर दी लेकिन उसके अंदर का मन उसे समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियों के प्रति हरदम कुरेदते रहता था। मीडिया के माध्यम से इन कुरीतियों और अंधविश्वास की आड़ में स्वार्थी और अशिक्षित जनता द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार हनन को लेकर उसका मन हमेशा कचोटते रहता था। इस बीच गांवों से आने वाले मरीज भी अपने-अपने इलाकों में धर्म, ज्योतिष, जादू-टोना की आड़ में होने वाले अत्याचारों से उसे परिचित कराते रहते थे। युवा डाक्टर में इसके लिए कुछ करने का दीया तो जल रहा था, लेकिन वह उसी के अंदर ही था। धीरे-धीरे करीब तीन साल बीत गए, लेकिन उसने अपने दीए को बुझने नहीं दिया। फिर 1995 के आसपास का वह समय आया जब उसने छत्तीसगढ़ में जादू-टोना और झाड़ फूंक के प्रति लोगों मे फैले अंधविश्वास को अपने दोस्तों-परिचितों के साथ एक संगठन के माध्यम से दूर करना शुरू किया। पिछले बारह साल से यह अभियान लगातार चल रहा है। इस बीच कई बैगाओं-ज्योतिषियों की पोल खुलने के बाद उसे 1 सप्ताह के भीतर अकाल मौत होने का डर भी दिखाया, लेकिन सालों-सालों बीत जाने के बाद भी आज तक वह दिन नहीं आया। अब जिस बैगा-तांत्रिक के सामने भूत-प्रेत थर-थर कांपते थे, वे अब इस युवा डाक्टर का नाम सुनकर कांपते हैं, और आने की खबर मिलने पर अपना बोरिया-बिस्तर लेकर गायब हो जाते हैं। शुरू में डाक्टर के दोस्तों, रिश्तेदारों ने इसे एक डाक्टर का पागलपन करार दिया। कइयों जगह से पत्र आए, जिसमें उन्हें अपनी डाक्टरी पर ध्यान देने का सुझाव दिया गया। लेकिन इससे वह विचलित नहीं हुआ और अपने साथियों के साथ इस अभियान में जुटे रहा। इसका खामियाजा भी डाक्टर अपने क्लीनिक की आमदनी में कमी और परिवार के दिए जाने वाले समय में कटौती के रूप में देना पड़ा। लेकिन उसने अपने मन के दीए को आजतक बुझने नहीं दिया। अब यही दीया पूरे समाज को रोशन कर रहा है। इस दीए के जीवन के लिए उनके संगठन ने कभी भी सरकारी तेल-बाती का सहारा भी नहीं लिया। अब इस युवा डाक्टर- डा. दिनेश मिश्र को छत्तीसगढ़ में ही नहीं बल्कि पूरे देश में एक निस्वार्थ समाजसेवी और वैज्ञानिक जागरूकता फैलाने वाले डाक्टर के रूप में देखता है।
0. आपके हिसाब से वैज्ञानिक जागरूकता को लेकर छत्तीसगढ़ की क्या स्थिति रही है?
00. वैज्ञानिक जागरूकता के प्रति यहां की स्थिति बहुत खराब है। यहां के लोग बहुत जल्दी किसी भी अफवाह पर विश्वास कर लेते हैं। समय-समय पर यह देखने को मिलते रहा है, जैसे गांवों में चुड़ैल की अफवाह की वजह से सैकड़ों गावों में घर के बाहर ओम नम: शिवाय लिखे हुए मिलता था। अभी एक बच्चे की मां वाली अफवाह में भी यही हुआ। मूर्ति के दूध पीने की घटना होती है तो पूरे प्रदेश में इसका असर देखने को मिलता है। यहां के लोग सीधे-साधे हैं, जागरूकता की कमी के कारण वे अफवाहों पर तुरंत भरोसा कर लेते हैं।
0. यहां ऐसी कौन-कौन सी धारणाएं चलन में हैं, जिन्हें विज्ञान नहीं मानता?
00. यहां सबसे ज्यादा मान्यता टोनही की है। हम लोगों को करीब 150 महिलाओं के नाम मालूम हैं, जिन्हें जादू-टोना करने के आरोप में टोनही करार देकर मौत के घाट उतार दिया गया। हम लोगों की इनमें से बहुत सारी महिलाओं के परिजनों, गांववालों तथा इन्हें मारने वालों से बात हुई है, जिसमें उन्होंने माना है कि महिालओं को अंधविश्वास के कारण मारा गया है। अभी मैं तर्रा गांव गया था। जहां गांव वालों ने फुलवंतिन बाई नाम की एक महिला को टोनही के नाम पर मार डाला था। हमारी गांववालों, जिस बच्चे की वजह से फुलवंतिन को टोनही करार दिया उससे (अब वह बड़ा हो गया है), उसके मां-बाप तथा सरंपच आदि से बात की। आज की स्थिति जिस परिवार की वजह महिला को टोनही करार देकर गांववालों ने मार डाला था, वह ठीक-ठाक और सुखी है, लेकिन फुलवंतिन का तो पूरा परिवार उजड़ गया। गांववाले अब मानते हैं कि उन्होंने अंधविश्वास की वजह से महिला को मार डाला था। कई सारी बीमारियों को लेकर भी यहां अंधविश्वास है, लोग मानते हैं कि इसके पीछे जादू-टोने का हाथ हाथ है। किसी ने नजर लगा दिया है। कई मामलों में जिसका हमें पता चल जाता है, हम मरीज को शहर लेकर आते हैं और इलाज कराते हैं।
0. इस मामले में आप शिक्षा की क्या भूमिका पाते हैं?
00. शिक्षा तो बहुत आवश्यक है, इसी से लोगों में वैज्ञानिक जागरूकता बढ़ेगी। अभी भी हम जब बहुत सारी जगहों पर जाते हैं तो लोग बताते हैं कि उनके यहां प्रायमरी और 8 वीं के बाद शिक्षा के लिए स्कूल नहीं हैं। बच्चों को साइकिल से 10-15 किमी दूर पढ़ने के लिए जाना पड़ता है। कुछ लोग लड़कों को तो भेज देते हैं, लेकिन लड़कियों को भेजने से परहेज करते हैं। ग्रामीण इलाकों में 10-20 किमी तक स्कूल नहीं, ऊपर से हमारे प्रदेश का कई हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित है, जिसके वजह से वहां के लोग अपने बच्चों की पढ़ाईको लेकर ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखाते हैं। ज्यादातर लोग 5-8 वीं के बाद अपने बच्चों की शिक्षा रोक देते हैं और उन्हें रोजगार आदि में लगा देते हैं।
0. ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं को इन बुराइयों से निपटने में आप कितना सक्षम पाते हैं?
00. शिक्षा जैसी स्थिति ग्रामीण इलाकों की स्वास्थ्य सुविधाओं का भी है। दूर-दूर तक अस्पताल नहीं हैं, अगर हैं भी तो वहां डाक्टर-दवाईयां नहीं हैं। अस्पताल में इलाज का इंतजाम नहीं होता। शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा धीरे-धीरे सुधर रही हैं, लेकिन अभी इसे दुरूस्त होने में बहुत लंबा समय लगेगा। मैंने कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री से कहा भी था कि हर जिले में एक-एक मेडिकल कालेज खोला जाए। इससे शिक्षा और चिकित्सा की ढेर सारी समस्या खतम हो जाएगी। लोग शहरों में नौकरी करना चाहते हैं तो उन्हें इन कालेजों में ही नौकरी करने दो। इससे उन लोगों को भी फायदा होगा जो मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेश या दूसरे प्रांत जाते हैं। यहां जब पढ़ाई की अच्छी सुविधा हो जाएगी तो छात्र बाहर क्यों जाएंगे?
0. कुछ पढ़े-लिखे लोग भी अंध विश्वास करते हैं, इसका अनपढ़ लोगों पर कैसा असर पड़ता है ? कुछ घटनाएं बताएं जो आप को याद हों।
00. बहुत सारे पढ़े-लिखे लोग अंधविश्वास पर भरोसा करते हैं। ये वे लोग होते हैं, जो चमत्कारिक रूप से सफल होने या बहुत जल्द सफल होने का ख्याल रखते हैं। वे चाहते हैं कि कोई ताबीज मिल जाए या अंगूठी मिल जाए जो उन्हें जल्द से सफल बना दे। एक पूर्व केंद्रीयमंत्री हैं जिन्होंने सार्वजनिक मंच से माना था कि वे अंधविश्वास को मानते हैं। प्रदेश के एक दिग्गज नेता के बारे में भी कहा जाता रहा है कि उनकी जो सड़क दुर्घटना हुई थी वह जादू-टोने के कारण हुई थी। राजनेता भी अंधविश्वास को बाते और प्रश्रय देते हैं। लोगों को लगता है कि इतना बड़ा पढ़ा-लिखा आदमी जिसके पास सारी सुविधाएं हैं जब वह इसे मान रहा है तो हम क्यों नहीं। हमारे पास तो न कोई सुख-सुविधा का साधन हैं और न ही पढ़ाई और चिकित्सा का। लेकिन इन लोगों को यह भी देखना चाहिए कि जब ये बीमार होते हैं तो अपना इलाज बैगा-ज्योतिष से कराने के बदले एस्कार्ट, अपोलो आदि में क्यों कराते हैं। बड़े-बड़े अफसर भी अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं, छग के एक पुलिस अफसर को तो हम सभी लोग जानते हैं जिसने एक बाबा की शरण ले ली थी और उनका भक्त हो गया। यूपी के आईजी श्री पांडा का उदाहरण हैं यो लोग सब कुछ जानते हुए भी अंधविश्वास को आत्मसात करते हैं। जिसका दूसरों पर असर पड़ता।
0.यूपी के आईजी से मिलते जुलते मामलों को मानसिक बीमारी के नजरिए से भी क्या देखा जा सकता है, किन राजनेताओं को आप अंधविश्वास के खिलाफ खड़ा हुआ पाते हैं?
00. यूपी के आईजी वाले मामले में तो डाक्टरों ने कहा ही था कि उन्हें बाईकूलर सिंड्रोम नामक मानसिक बीमारी हो गई है। इसमें आदमी कुछ समय के लिए अपने को कुछ दूसरा ही समझने लगता है। गावों में भूत-प्रेत लोगों के आने वाले मामले में भी यही रहता है। लेकिन भूत-प्रेत में लोगों को मार पड़ती है पर जब वहीं कोई इसे भगवान का नाम दे देता है तो उसके पास लोगों का तांता लग जाता है। उसकी पूजा होने लगती है। इसे हम अभी आई भूल-भूलैया और लगे रहो मुन्नाबाई जैसी फिल्मों से अच्छी तरह समझ सकते हैं। जिसमें इस बीमारी के बारे में अच्छे से समझाया गया है।
0. टोनही की धारणा के बारे में कुछ बताएं ?
00. इसके मूल में तो अशिक्षा है। पहले जब लोगों को बीमारियों के बारे में जानकारी नही होती थी और कोई बीमार हो जाता था तो इसके पीछे वे जादू-टोने को कारण मानते थे। इसमें सबसे सरल शिकार वे महिलाएं होती हैं, जो विधवा हो, जिनके बच्चें या पति मर गए हों, शारीरिक रूप से कमजोर रहती हैं, जिनकी हरकतें संदिग्ध होती हैं और सबसे बड़ी बात जो गरीब होती थीं। इन्हें लोग टोनही का नाम दे देते थे और किसी के बीमार होने पर उन्हें ही दोषी माना जाता है। जिसके लिए उनकी सार्वजनिक रूप से पिटाई के साथ मार दिया भी दिया जाता था। यह कुप्रथा सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही नहीं है बल्कि उड़ीसा, असम, बिहार, राजस्थान, हरियाणा आदि जगहों पर भी यह व्याप्त हैं। वहां इसे डायन के रूप में जाना जाता है। कई जगह तो ऐसी घटना में उन्हें गड़ासे से काट दिया जाता है। कभी-कभी यह भी देखा गया है कि अगर ऐसी महिला ने किसी को खाने को दे दिया, या किसी को छू लिया भले वह महिला किसी संक्रमण का शिकार हो जिसकेो वजह से उसके संपर्क में आने वाला बीमार हो गया हो । उसके बाद अगर वह बीमार पड़ गया तो लोग उस महिला को ही टोनही करार दे देते हैं। इसमें यह भी है कि अभी तक की एक घटना में भी किसी संपन्न घर की महिला पर यह आरोप नहीं लगया गया है और न ही किसी पुरूष को। क्योंकि संपन्न घर की महिला के परिवार वाले इसका प्रतिरोध करते हैं और पुरूष विरोध करता ही है। हम जहां भी जाते हैं लोगों को यही बताते हैं कि अगर महिला में ऐसी कोई शक्ति होती तो वह गरीब क्यों रहती? वह अपने को बचा क्यों नहीं पाई? वह लोगों से मुकाबला कर सकती थी। शारीरिक रूप से ठीक हो सकती थी। लोगों के पास इसका जवाब नहीं होता। ऐसी महिलाएं ही प्रताड़ित की जाती हैं, जिनकी मदद करने वाला कोई नहीं होता। हमें आज तक एक भी संपन्न महिला ऐसी नहीं मिली जिस पर टोनही होने का आरोप लगा हो।
0. टोनही कानून बनाने में आपके संगठन की क्या भूमिका रही ?
00. हमने इसके लिए अपने स्तर पर पूरा प्रयास किया। मानवाधिकार आयोग से मिले, राज्य मानवाधिकार आयोग में भी इसके लिए मांग की। मुख्यमंत्री से मिले, विधायकों को पत्र लिखा कि इस मामले को उठाया जाए। धीरे-धीरे यह कानून तो बन गया। लेकिन अभी भी गावों में इस कानून के प्रति जागरूकता नहीं हुई है। हम लोग हरेली आदि अवसरों पर गावों में जाकर इसका प्रचार-प्रसार करते रहते हैं। हम गांववालों को बताते हैं कि जिस चीज से आप डर रहे हो वह सारा सामान तो आपके आसपास मौजूद है। गांव गंदगी फैली हुई है, लोगों में शारीरिक साफ-सफाई का अभाव है। जिसकी वजह से मलेरिया, दस्त आदि बीमारी हो रही है। कोी महिला आपको थोड़ी ना बीमार कर रही है। कोई बैगा आप को बोल देगा कि इसके लिए कोई महिला जिम्मेदार तो आप उसके खिलाफ खड़े हो जाते हो। बैगा को बीमारी के इलाज के लिए बुलाना ही नहीं चाहिए। कई बार देखा गया है कि घर में बैगा झाड़-फूंक के दौरान कह देता है कि बाहर जो महिला घूम रही है उसी ने टोना किया है। होता यह है कि गांवों में घर में शौचालय का इंतजाम होता नहीं है, महिलाओं को बाहर जान पड़ता है। उसी समय बैगा की बात मानकर लोग महिला ढूंढ़ना शुरू कर देते हैं। नित्यक्रिया के लिए बाहर गई महिला अगर उन्हें मिल जाती है तो वे उसी को टोनही मान लेते हैं। हमने कई मामलों के पीछे ऐसा कारण पाया है। हम लोग हरेली समय गावों, श्मशान घाट, तालाबों पर जाकर वहां झाड़-फूंक कर रहे लोगों को यही समझाते हैं।
0. टोनही के अंधविश्वास की वजह से क्या नुकसान समाज-देश को होता है ?
00. देखिए आप जब किसी को टोनही के नाम पर मार डालते हो या उसे सार्वजनिक रूप से मारते-पीटते हो तो यह उसके मानवाधिकार का हनन होता है। कई बार ऐसी महिलाओं का गांव से बहिष्कार हो जाता है। लोग उनसे कोई संबंध नहीं रखते हैं, बात नहीं करते हैं। यह चीज बिल्कुल गलत है। इससे देश को समाज को नकसान निसंदेह रूप से होता है।
0. इन प्रकरणों में कुछ स्वार्थी लोगों द्वारा अपने फायदा के लिए किसी महिला टोनही घोषित करने की घटनाएं भी क्या देखने को मिलती हैं? आप लोगों ऐसी महिलाओं के पुनर्वास के लिए भी कुछ करते हैं?
00. कहीं-कहीं किसी स्वार्थी व्यक्ति का हाथ होने का मामला पाया जाता है, लेकिन इसकी संख्या न के ही बराबर होती हैं। क्योंकि ज्यादातर मामलों में समूह द्वारा महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है। पुनर्वास के लिए हम सरकार से ऐसी महिलाओं की पहचान करके उन्हें राहत दिलाने का काम करते रहते हैं। ऐसी महिलाओं को रहने के लिए राज्य सरकार से आवास भी उपलब्ध कराने के लिए हम लगातार मांग करते रहते हैं। हम लोग सरकार से यह भी मांग कर रहे हैं कि ऐसी घटनाओं की शिकार महिलाओं के पुनर्वास के लिए एक नीति बनाई जाए। हम लोग चूंकि आज तक सरकार से पैसा लेकर कोई काम नहीं किया है। हमारा संगठन आपस में जुटाए गए धन से ही प्रचार प्रसार का काम करता है। हमने एकाध बार ऐसा कोई प्रोजेक्ट बनाने की कोशिश भी करनी चाही तो पता चला कि प्रोजेक्ट को पास कराने के लिए इतना प्रसेंट कमीशन देना होगा। फिर हमने इससे अपना हाथ खींच लिय॥ क्योंकि हम अपने उद्देश्य से भटकना नहीं चाहते थे।
0. टोनही और अंधविश्वास की कुछ बड़ी और वीभत्स घटनाएं ?
00. एक घटना लचकेरा की थी, जिसमें तीन महिलाओं को गांववालों ने पहले करेंट लगाया। फिर उन्हें नंगा करके जुलूस निकाला था। राजनांदगांव के तारनटोला में फुलवती को रात में घर से निकालकर पीटा गया। इस बीच वह किसी तरह भागने में सफल हो गई तो उसे दोबारा पकड़कर लाया गया और पीटा गया। फिर उसे तालाब में फेंक दिया। महिला तैरकर बाहर आ गई। फिर उसे बांधकर मारा गया। जिसमें वह मर गई। गांववाले उसकी लाश को नाले के पास लाकर जला दिया। इस प्रकरण में पूरा गांव जेल चले गया था। कवर्धा में फूलवंतिन वाले मामले में रात में गांववाले उसके घर पहुंचे और भौजी-भौजी की आवाज लगाई। उसका पति 3-4 साल पहले मर गया था, दो बच्चे थे उसके। जब उसने दरवाजा खोल दिया तो उन्होंने एक बच्चे का नाम लेकर कहा कि उसे तुमने बीमार किया, उसे ठीक करो। जब उसने इससे अज्ञानता जताई तो उसे पीटना शुरू कर दिया गया। वह भाग न सके इसके लिए उसके कपड़े उतारकर जला दिया गया। पिटाई से जब वह बेहोश हो गई तो उसे रस्सी में बांधकर दो किमी तक साइकिल के पीछे खींचा गया। जिसके बाद उसकी मौत हो गई। फिर उसे एक कुएं में पत्थर बांधकर डाल दिया गया। जिसमें पत्थर के अलग हो जाने के बाद उसकी लाश ऊपर आ गई। इस बीच रातभर उसके दोनों बच्चे गांव में अकेले घूमते रहे। अभी हम लोग बीच में वहां गए थे तो पता चला कि बच्चे अपने मामा के गांव चले गए हैं।
0. नए कानून को कितना कारगर पाते हैं, इसमें आपके हिसाब से क्या चीजें और होनी चाहिए?
00. हम लोग मांग करते रहे हैं कि इसमें जो जुर्माने की राशि है उसे और बढ़ाया जाए। वह इतना हो कि उससे उस महिला का पुनर्वास हो सके। इस राशि को सरकारी खाते में जमा करने की बजाए पीड़ित को दिया जाना चाहिए। ऐसी घटनाएं होने पर वहां के सरपंच आदि जनता के नुमाइंदों को जिम्मेदार माना चाहिए और उन्हें भी सजा होनी चाहिए। घटना के बाद पुलिस को कड़ाई से दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। कई बार पुलिस के ढीले-ढाले रवैए से भी एएसी घटनाओं को बढ़ावा मिलता। पुलिस को ऐसी सूचना मिलने पर पीड़िता की तुरंत मदद के लिए सामने आना चाहिए। जबकि होता यह है कि प्रशासन जब तक किसी की मौत न हो जाए और जब तक बड़ी प्रताड़ना नही होती, वह सक्रिय नहीं होता। ऐसा करके ऐसी घटनाओं की संख्या में कमी लाई जा सकती है।
0. इस अंधविश्वास के खिलाफ आप लोग किस तरह से प्रचार-प्रसार करते हैं?
00. हम लोग ऐसी घटनाओं के बाद गांव में जाकर वैज्ञानिक जागरूकता बढ़ाने का काम तो करते ही हैं, साथ ही गांव-गांव जाकर लोगों की बैठक लेते हैं। हम लोगों से पूछते हैं कि वहां कौन-कौन सा अंधविश्वास फैला है। हम लोगों को बताते हैं कि जब आपकी साइकिल, टीवी, ट्रैक्टर खराब होती है तो आप क्या करते हैं, आप उसे मिस्त्री के पास ले जाकर बनवाते हैं। लेकिन जब आप खुद बीमार होते हैं तो बैगा से झाड़-फूंक कराने लगते हैं। हम लोग स्कूलों, एनएसएस के कैंपों में जाकर वैज्ञानिक जागरूकता बढ़ाते हैं। कई बार जब हमें पता चलता है कि कोई बैगा लोगों को वेवकूफ बना रहा तो हम वहां जाकर उसका फंडाफोड़ करते हैं। उनसे पूछते हैं कि बताओ तुम्हारे साथ अगले 20 मिनट में क्या होने वाला है। वह बोलता है कि कुछ नही, उसे हम बताते हैं कि आप जेल जाने वाले हैं। बैगाओं द्वारा किए जाने वाले कई जादू हम उसे करके दिखाते हैं। कई बैगा जब हमें हड्डी निकालने या अन्य चीजें निकालने का दावा करते हैं, तो हम उन्हें कहते हैं कि हमारे साथ नक्सली इलाकों में चलो और यब बताओ कि कहां-कहां लैंड माइंस लगे हुए हैं। फिर क्या बैगा भाग खड़े होते हैं। गांवों में इकट्ठा लोगों को बताते हैं कि जब बाबा को अपने भविष्य के बारे में नहीं पता है तो यह आपके दुख कैसे दूर कर सकता है। पीलिया के फर्जी उपचार करने वालों का भी फंडाफोड़ करते हैं। समाचार पत्रों में लेख आधि के माध्यम से लोगों के बीच सही बात पहुंचाने की कोशिश करते रहते हैं। गांव में लोगों को इससे संबंधित पर्चे पुस्तकें भी बांटते हैं। जहां-जहां जाते हैं वहां मीटिंग के बाद निशुल्क नेत्र चेकअप का शिविर भी लगाते हैं, कई बार होता है कि मीटिंग 1 घंटे ही चलती है, लेकिन शिविर 4-5 घंटे तक लगाना पड़ता है। क्योंकि लोग बड़ी संख्या मेें आए हुए रहते हैं। हम लोगों को अपने से जोड़ने के लिए सभी को अपना नंबर-पता देकर किसी भी केस में सूचना देने का अनुरोध करते हैं। अब 12 साल बाद हमारे पास सूचनाएं आने लगी हैं।
0.कुछ और रोचक घटनाएं ?
00. राजानांदगांव की एक घटना हैं वहां पुराने चीरघर में कहा जाता कि यहां भूत रहते हैं। लोगों में काफी भय व्याप्त हो गया था। हम लोग वहां गए और रात में चीरघर में घुसे। वहां शराब, सिगरेट, नमकीन के पैकेट पड़े हुए थे। हमने लोगों से पूछा कि क्या यहां का भूत सराब, सिगरेट पीता है, फिर लोगों के समझ में आया कि उन्हें कोई वेवकूफ बना रहा था। बाद में उस चीरघर को तुड़वा दिया गया। बस्तर में पिछले साल हल्ला हो गया कि रात में एक प्रकाश पूंज घूमता है और जो उसे देख लेता है बेहोश हो जाता है। हम लोगों ने वहां कई रात इसकी खोज की तो पता चला कि एक आदमी कुत्ते के शरीर में टार्च बांधकर छोड़ देता है। बाद में लोगों ने उस कुत्ते को मार दिया।
0. इसके पीछे क्या कोई वैज्ञानिक आधार पाते हैं?
00. यह सभी अंधविश्वास की वजह से लोग करते हैं। जहां तक लोगों में भूत-भगवान के आने की बात है तो वह मानसिक बीमारी हो सकती है। ज्योतिष को बी मैं गलत मानता हूं। आपको याद होगा कि जब अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बने थे तो किसी राजनेता ने उन्हें शपथग्रहण के लिए मुहूर्त निकालने का सुझाव दिया था। तब उन्होंने कहा था कि सूरज चमक रहा है। पृथ्वी घूम रही है, दिन-रात हो रहे हैं। तब तक मुझे किसी मुहुर्त की जरूरत नहीं है। मेरे लिए हर घड़ी, हर दिन शुभ है। जवाहरलाल नेहरू जी भी अंधविश्वासों के घोर विरोधी थे।
0. आपके अंदर इसके प्रति रूचि कैसे जागी ?
00. मुझे शुरू से यह सबी चीजें कचोटती थी। मन में सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति कुछ करने की इच्छा रहती थी। शुरू में अपने डाक्टर तथा और क्षेत्रों के दोस्तों से इसके लिए बात की। सभी ने साथ देने के तैयार हो गए और काम शुरू हो गया। शुरू में हम रायपुर के आसपास ही काम कर पाते थे। धीरे-धीरे संपर्क बढ़े तो हम पूरे छत्तीसगढ़ में जाने लगे हैं। हमारी संस्था में इस समय अलग-अलग फील्ड के करीब 50 लोग हैं। हमने कबी भी किसी तरह का सरकारी अनुदान नहीं लिया। इसके लिए शुरू में ही तय कर लिया गया ता। क्योंकि लोगों का कहना था कि लोग ऐसी संस्था कमाई के लिए बनाते हैं।
0. डाक्टरी के पेशे को कैसे समय देते हैं, कभी किसी को चैलेंज किया है?
00. समय तो उतना ही होता है, लेकिन मैं उसे किसी तरह मैनेज करता हूं। कुछ नुकसान तो जरूर होता है, लेकिन लोक हित में यह न के बराबर है। हम लोगों ने एमपी चुनाव के समय ज्योतिषियों को चैलेंज किया था कि बताएं कौन चुनाव जीतेगा। उसमें बहुत सारे ज्योतिषियों के पत्र आए, लेकिन कोई भी सही भविष्यवाणी नहीं कर सका।
लेबल साक्षात्कार स्टोरी साक्षात्कार, सामाजिक
'बुनियादी काम नहीं कर पा रही है पुलिस'

( रायपुर, 15 जनवरी 2008, दोपहर 2 बजे )
00- पुलिस बल की कमी एक बहुत बड़ा कारण है जिसके चलते बहुत सी बातों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है-जैसे वीसीएनबी यानी विलेज क्राइम नोट बुक। एक समय था जब गांव में गश्त लगती थी और उसकी एक रूटीन थी कि महीने में इतनी गश्त लगेगी इतने गांवों में लगेगी। गश्त के दौरान थानेदार उन गांवों में वीसीएनबी लेकर जाता था और बैठकर मिलान करता था कि यहां पर बदमाश कौन है, किन पर भरोसा किया जा सकता है, किन पर नहीं किया जा सकता, यहां की लोकल समस्याएं क्या हैं, यहां कोई झगड़ा तो नहीं होने वाला है। पिछले 12-15 साल से यह प्रक्रिया कम हो गई है, या बंद हो गई है। इसके पीछे कारण है कि पिछले कई सालों से पुलिस में भर्ती नहीं हुई, जिससे थानों में जो बल था वह आधा हो गया है। जिसकी वजह से गांवों में गश्त बंद हो गई। अब किसी गांव में जब कोई घटना होती है, तभी थानेदार वहां जा पाता है, उस समय गांव के बारे में उसे उतनी जानकारी नहीं मिल पाती है। पुराने जमाने में में गांवों में उजली और अंधेरी रात में किस तरह गश्त लगेगी यह निर्धारित होता था। दूसरी चीज, इस बीच गांवों की आबादी भी बढ़ी उसकी अपेक्षा पुलिस का अनुपात कम होता गया। पुराने हिसाब से थाने का बल और बढ़ना चाहिए था, वह भी नहीं हुआ। हम प्रयास कर रहे हैं कि पुलिस में जो पुराना नियम था उसे फिर चालू किया जाए। इसमें समस्याएं भी बहुत सारी हैं, क्योंकि अभी फोर्स उतनी नहीं है कि हम उस तरह की गश्त कर पाएं। इसके लिए हमने बोला है कि इसमें जनता का सहयोग लीजिए। ग्राम रक्षा दल बनाने की कोशिश कीजिए। ताकि पुलिस को तुरंत जानकारी मिल सके। जहां तक सुहैला कांड का सवाल है, वहां रात में नाचा कार्यक्रम के दौरान दो सिपाही थे, उन्होंने रात में हुए झगड़े को शांत करा दिया। उन्हें लगा कि सब ठीक हो गया, वो इस बात का अंदेशा नहीं लगा पाए कि कल फिर यह झगड़ा तूल पकड़ सकता है। जांच में इस बात का पता लगाने के लिए कहा गया है कि दोनों सिपाहियों ने थाने में आकर रात की घटना की जानकारी दी थी कि नहीं?
पुराने जमाने में सिपाहियों को इंफार्मेशन नोट बुक और आब्जर्वेशन नोट बुक दी जाती थी। इंफार्मेशन नोटबुक में वह वीएसएनबी से जानकारियां नोट करके रखता था। जब भी वह गांवों में किसी काम से जाता था तो वह नई जानकारियां नोट करके लाता था। उसमें यह भी जानकारी रहती थी कि अगर मर्ग हो गया है तो इसकी सूचना किसे देनी है, किससे संपर्क करना है, किससे गांव में हो रही गतिविधि के बारे में जानकारी लेनी है। अब यह चीज बंद हो गई है। आब्जर्वेशन नोट बुक में वह खुद के अध्ययन के हिसाब से जानकारियां नोट करके लाता था। यह भी अब खत्म हो गया है। मप्र के दिनों में भी यह बंद हो गया था, लेकिन उसकी जगह सिपाही एक नोटबुक रखते थे और उसमें जानकारियां नोट करके लाकर थानेदार को दिखाते थे। थानेदार उस पर दस्तखत करता था और जरूरी जानकारी वीसीएनबी में दर्ज कर लेता था और अपने हिसाब से कार्रवाई करता था। ये सब चीजें आज से 22 साल पहले जब मैं यहां था तब चालू थीं, अब आकर पता चल रहा है कि ये सब खत्म हो चुकी हैं। एक तीसरी चीज और उस समय थी कि एसपी अपने हाथ से क्राइम डायरी भरता था। अब वह क्राइम डायरी नहीं भरता, डीएसपी और एसडीओपी भरते हैं। क्राइम डायरी नहीं भरने की वजह से एसपी को यह पता नहीं चल पाता कि कहां क्या चल रहा है, उसे बड़ी घटनाएं ही मालूम हो पाती हैं। क्राइम डायरी भरने से एसपी को एक नजर में पता चल जाता था कि किस-किस थाने में क्या प्राब्लम चल रही है, किस-किस तरह के अपराध हो रहे हैं। उसे यह भी पता लग जाता था कि कौन सा थानेदार सही काम कर रहा है, कौन सा थानेदार तफ्तीश में अच्छा है, कौन लॉ एंड आर्डर सही तरीके से संभाल लेता है, कौन इंवेस्टिगेशन अच्छा करता है। इसके हिसाब से वह जरूरत पड़ने पर उन थानेदारों को काम के मुताबिक इस्तेमाल कर लेता था। थानों में एसपी तीन-तीन दिन का निरीक्षण करते थे। अभी भी निरीक्षण हो रहा है, उसमें बहुत लंबा लिखा भी जा रहा है कि यह रिकार्ड ठीक नहीं है, उसे दुरुस्त करने के लिए मेमो भेज दिया जाता है। लेकिन उन दिनों एसपी थाने में ही बैठकर रिकार्ड ठीक कराता था। रजिस्टर नहीं भरा है, वीसीएनबी में नोट नहीं पड़ा है, सब ठीक करवाता था। इसके बाद वहां एक सम्मेलन होता था, जिसमें एसपी थाने में पूरे स्टाफ को बुलाता था और प्रत्येक से इलाके में बारे में उसकी जानकारी लेता। इसमें जो पुलिसकर्मी इलाके में बारे में काफी जानता था उसे रिवार्ड भी दिया जाता था और जो कम जानता था उसे सजा। अब इसका स्वरूप बदलकर यह हो गया है कि पुलिसकर्मियों से उनकी समस्याएं पूछी जाती हैं, यह भी ठीक है, लेकिन हम पुराने स्वरूप को वापस चालू करने का प्रयास कर रहे हैं। सुहैला कांड का असल भी यही है कि अगर थाने में वीसीएनबी भरा गया होता और किसी ने उसका निरीक्षण किया होता तो उसे पता चल जाता कि सुहैला में यह झगड़ा लंबे समय से चल रहा है। उसमें थानेदार पहला काम करता कि प्रो-एक्टिव एक्शन लेता। पुलिस भेजकर वर्तमान स्थिति की जानकारी लेता। हम बुनियादी पुलिसिंग को भूल रहे हैं। हम त्वरित पुलिसिंग की ओर बढ़ रहे हैं । यहां समस्या है, यहां फोर्स लगा दो, यहां घटना हुई है, यहां इंवेस्टिगेशन कर लो। जब तक हम बुनियादी पुलिसिंग नहीं करेंगे, तब तक हम बहुत सारी चीजों को कंट्रोल नहीं कर पाएंगे। यह हमारे लिए और भी जरूरी हो गया है क्योंकि स्टाफ कम हो गया है, आबादी बढ़ रही है, राजधानी बन गई है, नए इलाके बढ़ रहे हैं, नए लोग आ रहे हैं, उनके साथ नौकर-चाकर आ रहे हैं, नए कारखाने खुल रहे हैं, उनमें काम करने के लिए लोग आ रहे हैं। वीसीएनबी चालू होने से उसमें कुछ तो भरा जाएगा, जैसे उस इलाके में कितने सजायफ्ता है, किसे कौन सी सजा हुई है, कौन निगरानीशुदा बदमाश है, कितनी बार चोरी हो चुकी है, कौन किस अपराध में लिप्त है इसकी जानकारी मिल सकेगी। इसे चालू नहीं करने से हो सकता है कि हम बड़ी-बड़ी चोरी, डकैती पकड़ लें, लेकिन रोजमर्रा के क्राइम को हम कंट्रोल नहीं कर पाएंगे। बुनियादी चीजों में बहुत मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन इससे पुलिस के पास हर इलाके की पूरी तस्वीर होती है। सुहैला कांड में जाति की समस्या भी सामने आई है। जाति की समस्या सिर्फ पुलिस नहीं सुलझा सकती। ये जाति की समस्या थी। बिहार में हम रहे हैं हम जानते हैं कि जाति संघर्ष कितना खतरनाक होता है। विदेशों में काउंटी पुलिसिंग में इसका बहुत अच्छा समाधान है, वहां पंचायतों का अपना थाना है, वह खुद ही पुलिसकर्मियों की भर्ती करती हैं। एक थाने में 5-10 पुलिसकर्मी होते हैं। थाने का हेड भी वहीं का लोकल होता है, उसे अच्छी तरह से पता होता है कि गांव में क्या चल रहा है। उस पर जिम्मदारी भी होती है, क्योंकि वह सही काम नहीं करेगा तो पंचायत उसे निकाल देगी। हमारे यहां यह इसलिए नहीं हो सकता कि ना तो यहां की पंचायतों में उतनी पारदर्शिता है और न ही उतना पैसा। हमारे यहां रूरल थानों के क्षेत्र में 50-100 गांव आते हैं, जहां बराबर जा पाना फोर्स की कमी के कारण संभव नहीं है। इसके उपाय के रूप में हमारे पास कोटवार सिस्टम था, जो कि अभी भी है, लेकिन इसमें अब समस्या ये हो रही है कि हम जो जानकारी उससे ले पाते थे अब नहीं ले पा रहे हैं। क्योंकि कोटवार भी अब गांव की अंदरूनी राजनीति का हिस्सा बन जा रहा है। वह उसी गांव का रहने वाला होता है, इसलिए वह अपने फायदे-नुकसान के हिसाब से पुलिस को जानकारी देता है। उसको मिलने वाला मानदेय भी ना के बराबर ही है। दूसरा पुलिस गांव में फोर्स की कमी की वजह से नहीं जा पा रही है। पुलिस गांव के आसपास होने वाले क्राइम में ही उलझी रहती है जिससे बुनियादी पुलिसिंग नहीं हो पा रही है। हमने कहा है कि कम से कम वीसीएनबी का रिकार्ड दुरुस्त कर लिया जाए ताकि कोई जब गांव में जाए तो वीसीएनबी पढ़कर जाए,जिससे उसे उस गांव के बारे में जानकारी रहे। अगर पुलिस वीसीएनबी पढ़ने लगेगी तो वह भरना भी शुरू कर देगी।
जहां तक एसपी के तीन दिन के निरीक्षण का सवाल है उसका भी हल निकाला जा सकता है। हमने बोला है कि आप थानों का निरीक्षण करें, एक साथ तीन दिन रुकने की बजाय आप एक-एक दिन निरीक्षण कर सकते हैं, थानेदार को निरीक्षण के बाद बोल दीजिए कि फलां-फलां रिकार्ड ठीक नहीं है, इसे दुरुस्त करवाएं हम दोबारा आकर देखेंगे। शहर की बात छोड़ दीजिए तो रूरल थानों में तो इसे किया ही जा सकता है, एसपी की जगह एसडीओपी और डीएसपी भी निरीक्षण कर सकता है, दरअसल होता यह है कि एक बार आदत छूट जाने के बाद उसे वापस लाने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। हमारे जमाने में हम लोग रोज दिन की शुरुआत ही क्राइम डायरी लिखने से करते थे। सुबह सात बजे से 8 -9-10 बजे तक डायरी लिखते थे फिर तैयार होकर आफिस जाते थे। यह आदत में शामिल था। उस समय दो दिन परेड होती थी- मंगलवार और शुक्रवार। आप हफ्ते में दो दिन लाइन में जाते थे तो मालूम रहता था कि वहां क्या हो रहा है। सिपाहियों से बात करते थे तो पता चलता था कि उन्हें क्या समस्या है। जब हम यह सब कुछ छोड़ देंगे, तो समस्याएं होंगी ही। अब फोर्स कम है, और वही लोग रात में डयूटी करके आए रहते हैं तो सुबह आप किसकी परेड लेंगे। चार आदमी की परेड तो लेंगे नहीं। अब ये हो रहा कि परेड न होने की वजह से अधिकारी लाइन ही नहीं जाते हैं। हमने कहा है कि आप बगैर काम के ही रोज लाइन में जाकर एक-दो घंटे बैठिए। इसी बहाने आप कर्मचारियों से बात करेंगे, आप को पता चलेगा कि उसे रोजमर्रा या अन्य वजह से क्या परेशानी हो रही है, जिसका उसकी कार्यक्षमता पर असर पड़ रहा है। जहां तक जनता का कानून हाथ में लेने का सवाल है उसमें कई बातें होती हैं, पहली कि जब कोई चीज गांव में उबल रही है, और पुलिस को उसकी जानकारी नहीं होती है तो उसको संभालने के लिए आपको बहुत सख्ती करनी पड़ती है। अगर पुलिस इस वजह से सख्ती नहीं करती है कि वह संभाल लेगी, तब आप संभाल नहीं पाते हैं, यह बहुत संभव है। दूसरी यह कि यह स्थिति आई क्यों इसके लिए मैंने बताया ही कि मौलिक पुलिसिंग नहीं होने से थाने को यह पता ही नहीं चलता कि गांव में चल क्या रहा है। इसके साथ ही इसका राजनीतिक कारण भी होता है, जिसमें ऐसी चीजें कराई जाती हैं। चुनाव के आसपास इसका ग्राफ बढ़ जाता है। यह मामला इससे अलग है, यहां पुलिस यह अनुमान नहीं लगा पाई कि छोटी सी घटना कितना बड़ा रूप ले लेगी। अनुमान आप तभी लगा पाएंगे जब आपको पता होगा कि गांव ऐसे कौन से लोग हैं जो ऐसा काम कर सकते हैं, या फिर जो लोग गांव में इकट्ठा हुए हैं वे क्या करेंगे। इसलिए मैं कहता हूं कि जब तक पुलिस बुनियादी पुलिसिंग नहीं करेगी, तब तक समस्या का निदान नहीं हो सकता। हम सिर्फ समस्या खड़ी कर रहे हैं आज के लिए, कल के लिए।
0- फोर्स की कमी शहर-गांव के थानों में बनी हुई है, उसके लिए क्या किया जा रहा है, अभी थानों में जो फोर्स के स्वीकृत पद हैं वह 1992 की आबादी के हिसाब से हैं, क्या इसमें भी बढ़ोतरी की गई है? भर्ती के साथ क्या इस पर ध्यान दिया जा रहा कि फोर्स का दुरुपयोग अफसरों व नेताओं के बंगलों पर न हो?
00- राज्य सरकार ने पुलिस फोर्स को 21 हजार से बढ़ाकर 42 हजार कर दिया है। इसमें डीएफ, सीएएफ, एसटीएफ और एटीएस भी शामिल है। खाली पदों को भरने के साथ ही आबादी के हिसाब से थानों का बल बढाया भी गया है। चूंकि काफी लंबे समय से भर्ती हुई नहीं है, इसलिए इतनी बड़ी संख्या में भर्ती की नहीं जा सकती। दूसरी समस्या यह है कि अगर हम एक साथ भर्ती कर भी लेते हैं तो हम हवलदार-एएसआई कहां से लाएंगे। हम सिपाही और सब इंसपेक्टर के पदों पर ही भर्ती करते हैं। ऐसे में सिपाही और हवलदार को लीड कौन करेगा। इतने पदों पर एक साथ ट्रेनिंग की समस्या भी है। हम अभी स्टेप-टू-स्टेप भर्ती कर रहे हैं, ताकि हवलदार-एएसआई की कमी ना हो पाए। मेरा मानना है कि अगले दो साल में हम रूरल थानों में फोर्स की कमी को पूरा कर लेंगे। अभी तक करीब 5 हजार पदों पर भर्ती हो चुकी है।
दूसरी चीज फोर्स के दुरुपयोग की जो है उसमें एक सुरक्षा ढांचा बना हुआ है कि किस अफसर के यहां कितना बल तैनात रहेगा। हमारी समस्या यह हो रही है कि जब राज्य बना था तो अफसर व वीआईपी के लिए जो ढांचा बनाया गया था उसमें अब बढ़ोतरी हो गई है। अब वीआईपी और अफसर बढ़ गए हैं और बल उतना ही है। इसलिए इसमें मिस-यूज नहीं होता। अगर होता है तो इसके लिए दूसरे कारण हैं, जैसे अगर कोई एसपी डीएफ के जवानों को अपने हिसाब से बंगलों पर तैनात करता है तो इसका पता हमें नहीं चल पाता है। क्योंकि डीएफ एसपी के अधीन रहता है। जब ऐसे मामलों का पता चलता है तो उस पर कार्रवाई भी होती है। हालांकि सीएएफ का दुरुपयोग एसपी भी नहीं कर पाता है क्योंकि जवान के परेड इंसपेक्शन के समय तथा डयूटी बुक में वह नोट हो जाती है। हमने 40-50 सीएएफ के जवानों को बंगलों से हटाया है, इन्हें पीएचक्यू में रखा गया है, जो कि लॉ एंड आर्डर के समय जिला पुलिस की मदद करते हैं। सीएएफ का दुरुपयोग हम रोक रहे हैं। डीएफ का हमें पता नहीं चल पाता है, अगर पता चल जाता है तो दबाव तो डाला जा सकता है।
0- कम्युनिटी पुलिसिंग के लिए प्रदेश में क्या काम किया जा रहा है?
00- शहरों में हम हर मोहल्ले में कमेटी बनाने की धीरे-धीरे शुरुआत कर रहे हैं। यह कमेटी स्थायी नहीं रहेगी, हर दो महीने में इसके सदस्य बदलते रहेंगे ताकि किसी भी तरह से इसमें घालमेल ना किया जा सके। देखा गया है कि कमेटी के लोग पुलिस से मिल जाते हैं या एक समुदाय या गुट के लोग कमेटी से जुड़ जाते हैं जिससे पुलिस को कोई फायदा नहीं मिल पाता है। इससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को पुलिस से जुड़ने का मौका भी मिलेगा। इसको शुरू करने के लिए मीटिंग रखी गई है। अभी इसे हम बिलासपुर-रायगढ़ समेत चार शहरों में प्रायोगिक रूप में शुरू कर रहे हैं, ताकि इसमें अगर कोई सुधार करने की जरूरत पड़े तो उसे किया जा सके। फिर इसे सभी जिलों में चालू किया जाएगा। गांवों में ग्राम रक्षा दल बनाने के लिए थानेदारों को कहा गया है। हालांकि सभी गांवों में बनाना संभव नहीं है, लेकिन सेंसेटिव गांवों में रक्षा दल बनाना थानेदारों के लिए अनिवार्य किया गया है।
0- भारत में कौन से स्टेट की पुलिस आपको अच्छी लगी और क्यों? छत्तीसगढ़ पुलिस वैसा बनने के लिए क्या कर रही है?
00- देखिए यह ऐसा प्रश्न है कि आप किस हिसाब से देखते हैं। अगर क्राइम कंट्रोल के हिसाब से देखें तो महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, आंध्रा, कर्नाटक की पुलिस बहुत प्रोफेशनल है। इनका रिस्पांस टाइम काफी अच्छा है। इनके पास फोर्स अधिक है। ट्रेनिंग स्कूल्स अच्छे हैं। राज्य सरकारें पुलिस बजट पर काफी पैसा खर्च करती हैं। नार्थ इंडिया में फोर्स की कमी शुरू से रही है। मप्र पुलिस 15-20 साल पहले बहुत अच्छी मानी जाती थी। यहां पर एसपी के लेबल पर पब्लिक रिस्पांस काफी अच्छा था। इसका कारण भी मैंने खोजा है, यहां चूंकि रजवाड़े होते थे, इसलिए एसपी यह रिस्क नहीं लेता था वह किसी से ना मिले, ना जाने कौन किस राजा का आदमी हो। सत्तर के दशक में भी आधी रात को फोन करने पर एसपी फोन उठाते थे। आज जितने भी एडवांस स्टेट हैं वहा कमिश्नरी सिस्टम लागू है। कमिश्नरी सिस्टम में पुलिस के पास फंड भी अधिक होता है और पॉवर भी। उनके पास मजिस्ट्रेट के अधिकार भी रहते हैं। जबकि छग, मप्र, राजस्थान, यूपी, बिहार, उड़ीसा आदि में यह सिस्टम नहीं है। वहीं महाराष्ट्र, तमिलनाडु , केरला,आंध्रा, कर्नाटक, कलकत्ता में यह शुरू से है। इन राज्यों को यह बात जल्दी समझ में आ गई कि अगर राज्य को विकास करना है तो वहां की कानून व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त रखनी होगी। इसके लिए पुलिस पर खर्च अधिक करना होगा।
0- बंगलौर सहित कुछ जगहों में जनता सीधे पुलिस से शिकायत करने के बजाय वहां तैनात स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं को अपनी शिकायत दर्ज कराती है। इसे पुलिस द्वारा जनता के साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार को कम करने के लिए किया गया है॥ यहां ऐसा कुछ किया जा सकता है क्या?
00- यह काम कई जगह किया जा रहा है, इसकी शुरुआत तमिलनाडु कैडर के आईपीएस अफसर फिलिप्स ने की थी। पुलिस फ्रेंड्स आज कई राज्यों में काम कर रहे हैं, हालांकि ये साधारण मामलों को सुलझाने का प्रयास करते हैं, जब मामला उनसे नहीं संभलता तो वो इसे पुलिस के पास ट्रांसफर कर देते है। मेजर अफेंस में पुलिस सीधे कार्रवाई करती है। केरला, तमिलनाडु, आंध्रा में इस पर काम हो रहा है। पंजाब में टेरेरिज्म के बाद दूसरे टाइप से इस पर काम करने का प्रयास किया गया। लखनऊ में कोशिश की जा रही है। फ्रेंड्स पुलिस में पुलिस कम्युनिटी के पास नहीं जाती है, बल्कि कम्युनिटी ही पुलिस के पास जाकर कहती है कि वह उनकी मदद करना चाह रही है। पुलिस फ्रेंड्स पर पिछले दस साल में बहुत सारा काम हुआ है। हम यहां कम्युनिटी के पास जाकर कमेटी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। धीरे से यहां भी लोग पुलिस की मदद के लिए सामने आएंगे।
0- महिला थाने में पारिवारिक प्रकरणों को सुलझाने के लिए जो काउंसिलिंग की व्यवस्था की गई है उसे आप कितना सफल पाते हैं?
00- मैं इसे बहुत ज्यादा सफल नहीं पाता हूं, क्योंकि ज्यादातर मामलों को सुलझाने में टीम सफल नहीं हो पाती। इसके पीछे पुरुष और महिला के बीच फर्क और दहेज की व्यवस्था कारण हैं। आदमी महिला को अपने बराबर मानने को तैयार नहीं होता। महिलाएं शिक्षित हो रही हैं तथा अपना अधिकार मांगती हैं, तब विवाद पैदा होता है। इस समस्या को कोई भी काउंसलर सुलझा नहीं सकता क्योंकि घर जाते ही दोनों का एटीटयूड पहले जैसा हो जाता है। दहेज से संबंधित मामलों में काउंसिलिंग टीम को जरूर सफलता मिल रही है।
0- राजनेताओं द्वारा आए दिन पुलिस अफसरों को धमकाने की खबरें मिलती रहती हैं, पुलिस अफसरों पर नेता दबाव बनाकर मनमाफिक काम करवाते हैं, ना कहने पर उन्हें दंडित करवाने के लिए कहा जाता है, इसे आप किस तरह से लेते हैं?
00- यह समस्या नेता या अधिकारी की नहीं है, इसके पीछे सामाजिक परिवेश कारण है। यह सामंतवाद के शक्ति विखंडन से निकली है। जो चीज आप नेता के लिए बोल रहे हैं वह अधिकारी पर भी लागू होती है। अब शक्ति नेता और अधिकारी के पास आ गई है। दबाव में वही अफसर आते हैं जो खुद कानून से खेलने लगते हैं और करप्ट होते हैं। जो अफसर खुद दस गलत काम करेगा, तो वह दबाव में आएगा ही। इसका मतलब नेता और पुलिस से नहीं है, इसका सीधा मतलब आप की ईमानदारी से है। जब आप दस गलत काम करेंगे, तो दूसरे को कैसे मना कर सकते हैं। अगर आपने अपने नीचे गङ्ढा खोदकर रखा है तो आप लड़ेंगे कैसे, लड़ेंगे तो गङ्ढे में गिरेंगे जरूर। आप अगर ईमानदार हैं तो कार्रवाई कीजिए, कोई दबाव बनाता है तो उसे समझाइए और अपनी बात पर अड़िए। कोई भी आप का ज्यादा से ज्यादा क्या कर सकता है, ट्रांसफर । जहां नई जगह जाएं वहां भी ईमानदारी से काम करें, कितनी बार आपका ट्रांसफर किया जा सकता है, एक-दो-तीन-चार बार। अफसर को अपनी पर्सनालिटी खुद बनानी होती है। दबाव में वही आते हैं जिनकी गलती कोई दूसरा पकड़ लेता है। इसमें एक बड़ा रोल जिले के एसपी का भी होता है, अगर एसपी ईमानदार और दबाव में नहीं आने वाला है, तो इसका असर उसकी पूरी टीम पर पड़ता है। अन्यथा पूरी टीम भी उसके जैसी ही हो जाती है, क्योंकि वह ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारी के काम में भी दखल डालता है।
0- छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के खिलाफ इतनी बड़ी लड़ाई जा रही है, इस दौरान यह देखा जा रहा है कि कई पुलिसकर्मियों पर फर्जी इनकाउंटर के मामले दर्ज हो रहे हैं, अंबिकापुर की घटना इसका ताजा उदाहरण है, जिसमें पुलिस अधिकारी को इनामी नक्सली का इनकाउंटर करने पर पदोन्नति के साथ राष्ट्रपति पदक भी प्रदान किया गया था और उसी इनकाउंटर के लिए उस पर 302 का मामला कायम किया गया है, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
00- देखिए अंबिकापुर का मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए मैं इसपर नहीं बोलूंगा। मेरा मानना है कि अगर इनकाउंटर फर्जी है तो गलत है। पुलिस का अधिकार कानून के अंदर ही है। जब भी पुलिस कानून के दायरे से बाहर जाती है तो वह खुद ही गैरकानूनी हो जाती है। बहुत जगह देखा जा रहा कि जहां नक्सलवाद या आतंकवाद है, वहां ये लोग एक ग्रुप खड़ा कर देते हैं जो हर इनकाउंटर को फर्जी साबित करने का प्रयास करता है। अगर आप दस आदमी को गवाह के रूप में खड़ा कर देते हैं तो मुकदमा तो कायम हो जाएगा लेकिन मुकदमा कायम होने का यह मतलब नहीं है कि आप दोषी साबित हो गए। अगर आपका इनकाउंटर सही है तो कोर्ट से आपका छूटना निश्चित है। रही बात विभाग के सपोर्ट करने की तो विभाग जिस इनकाउंटर में संशय की स्थिति नहीं होती उसमें पूरी मदद करता है। लेकिन जिसमें संशय होता है उसमें एक सीमा तक ही किसी का साथ दिया जा सकता है। देश में कई मामले अधिकारियों द्वारा अपने फायदे के लिए फर्जी इनकाउंटर करने के सामने आए हैं। अब अगर कोई अधिकारी ऐसा करता है तो उसे कैसे रोका जा सकता है? हर जगह तो सीनियर अधिकारी उपस्थित होता नहीं है। जहां-जहां भी आतंकवाद या नक्सलवाद है, वहां यह समस्या सामने आ रही है, ऑल इंडिया लेबल पर भी इस पर विचार किया जा रहा है, लेकिन समस्या यह है कि हम किस आधार पर कह सकते हैं कि फर्जी इनकाउंटर नहीं होंगे। इसलिए हर इनकाउंटर के बाद उसकी मजिस्ट्रेट जांच कराई जाती है। अंबिकापुर वाले मामले में कोर्ट मजिस्ट्रेट जांच को नहीं मान रही है। डिपार्टमेंट ज्यादातर मामलों में अधिकारी का साथ देता है, उस समय तक उसे पगार भी मिलती है। कोर्ट यह नहीं कहता है कि आपने फर्जी इनकाउंटर किया है, कोर्ट का कहना यह रहता है कि उसके पास ये-ये प्रमाण मिले हैं, जिसमें प्रथम दृष्टया फर्जी इनकाउंटर होना पाया जाता है। फिर आप का काम होता है कि आप इसे झूठा साबित करें और जीतने के बाद डैमेज क्लेम भी कर सकते हैं।
0- बस्तर में इतने बड़े स्तर पर फोर्स तैनात की गई है, लेकिन वहां जो पुलिसकर्मी काम कर रहा है उसे ऐसा लगता है कि वह पनिशमेंट में वहां भेजा गया है। कुछ अधिकारी और नेताओं को बार-बार यह कहते भी देखा जाता है कि वह अधिकारी का ट्रांसफर बस्तर में करवा देगा। इसे आप किस नजरिए से देखते हैं?
00- देखिए यह यहां की घबराहट है, लेकिन जब आप लड़ाई के मैदान में कूद जाते हैं तो घबराहट नहीं रहती। इसका मैं उदाहरण देता हूं, अभी जो 12 पुलिसवाले मरे हैं वे लोग अपने एक मलेरिया पीड़ित साथी को पहुंचाने के लिए 35 जवानों की एक टोली में रवाना हुए थे। रास्ते में उन पर नक्सलियों ने अटैक कर दिया। 12 पुलिसकर्मियों ने बाकी साथियों को उसे लेकर जाने के लिए कहा। उन बारह लोगों को अच्छी तरह से पता था कि वे रुक रहे हैं तो उनकी मौत होनी निश्चित है, लेकिन फिर भी वे रुके, इससे पता चलता है कि फोर्स का मनोबल कितना ऊंचा है। यहां से पुलिसकर्मियों को जाते समय बुरा लगता है लेकिन वहां पहुंचने के बाद वह मोरल डाउन करके रह ही नहीं सकता है। रही बात पनिशमेंट की तो पुलिस का जवान लड़ने के लिए ही होता है, उसे इसे पनिशमेंट के रूप में नहीं लेना चाहिए।
0- आंध्र प्रदेश में जिस तरह से नक्सलियों से मोर्चा ले रही पुलिस को सुविधाएं मिल रही है, वैसा हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं? क्या हम फोर्स को आंध्र प्रदेश की तरह बैक सपोर्ट दे पा रहे हैं?
00- वेतन के मामले में हम भी आंध्र प्रदेश की तर्ज पर काम करने जा रहे हैं, एसटीएफ की सैलरी में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। डीएफ के जो जवान सघन नक्सल इलाके में हैं उनकी सैलरी 20 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्र में तैनात जवानों के वेतन में 15 प्रतिशत इजाफा करने का प्रस्ताव पास होने के लिए राज्य सरकार के पास भेजा गया है जो कि जल्द ही मंजूर हो जाएगा। रही बात संसाधन की तो जवानों को लगभग सभी जरूरी चीजें उपलब्ध कराई गई हैं, लेकिन देखा गया है कि जवान बुलेट प्रूफ जैकेट और टोपी भारी होने की वजह से नहीं पहनते हैं। यहां समस्या दूसरी है, नक्सलियों की मैन पॉवर ज्यादा है, वे लोग दंतेवाड़ा-बीजापुर के जंगलों में बराबर ट्रेनिंग कैंप चला रहे हैं, जिसमें झारखंड, आंध्रा, उड़ीसा , महाराष्ट्र आदि जगहों के 2 हजार के लगभग लोगों को 12 महीनों ट्रेनिंग दी जाती है। नक्सली 300 से ऊपर वाले पुलिस दल पर कभी हमला नहीं करते, वे 30-40 जवानों वाली टोली पर ही हमला करते हैं, बड़ी टोली के सामने से वे हट जाते हैं।
0- बस्तर में आप 22 साल पहले रहे हैं, आज के बस्तर को भी आप देख रहे हैं, वहां क्या बदलाव देखते हैं?
00- बस्तर में नक्सली प्राब्लम होने वाला है, इसकी जानकारी सबसे पहले शासन को हमने दी थी। सन 198 1 की बात है जब मैं एआईजी स्पेशल ब्रांच में था उस समय जानकारियां आने लगी थीं कि नक्सली उस इलाके में घूमने लगे हैं। ऐसा नहीं है कि उस समय मप्र में नक्सली नहीं थे, पहला नक्सली मप्र में 196 8 में पकड़ाया था भोपालपट्नम में। दूसरा 1971 में पकड़ाया था जगदलपुर में। उसके बाद मैंने पूरे बस्तर का दौरा किया। जंगलों में पत्रकार बनके घूमा, उस समय कोई आईडेंटिटी कार्ड नहीं देखता था। सुकमा, गोलापल्ली, भोपालपट्नम सहित पूरे इलाके का दौरा करके शासन को रिपोर्ट दी। उसके बाद मुझे वहां का एसपी बना दिया गया। उस समय आज की अपेक्षा बस्तर में पुलिस फोर्स बहुत कम था। कई थानों में मात्र 1-4 का ही बल था। फिर बहुत सारी फोर्स बढ़ाई गई। 198 2 में नई बटालियन बनाई गई। बस्तर डेवलपमेंट प्लान बना। मैं एसपी भी था और बटालियन का कमाडेंट भी। वहां पीटीएस खोला गया। जवानों को टे्रंड किया गया। उस समय कोंटा, गोलापल्ली, चिंतागुड़ा आदि इलाकों में नक्सलियों का मूवमेंट आधिक था। उस समय नक्सलियों ने ब्लास्ट करना शुरू नहीं किया था। चंद्रपुर में ब्लास्ट हो चुका था, आंध्रा में शुरू कर दिया था, लेकिन बस्तर में नहीं हुआ था। उस समय बस्तर बहुत शांत जगह थी। चारों तरफ हरियाली थी। मैंने अबूझमाड़ पैदल पार किया। उस समय वहां नक्सली नहीं थे। अब वहां दहशतभरा माहौल है।
फोटोग्राफी और पेंटिंग के लिए नहीं मिलता समय
0- आप कवि-साहित्यकार भी हैं, पुलिस की व्यस्त जिंदगी में इसके लिए समय कैसे निकालते हैं?
00- मैं सिर्फ कवि और साहित्यकार नहीं हूं, मैं फोटोग्राफर भी हूं, पेंटिंग भी करता हूं । मेरी फोटोग्राफी और पेंटिंग छूट गई। मेरी पेंटिंग की बस्तर सहित कई शहरों में एक्जीबिशन भी लग चुकी है। अभी सिर्फ कविता के लिए ही समय निकाल पाता हूं। वो इस लिए कि इसके लिए अलग से समय नहीं निकालना पड़ता, क्योंकि कविता कहीं पर भी और कभी भी सूझ जाती है। गाड़ी में चलते-चलते सूझ गया और उसे लिख लिया। मैं उन लोगों में नहीं हूं जो नौकरी के समय तमाम दूसरे काम करते हैं। मुझे पैसा किसलिए मिलता है, पुलिस की नौकरी के लिए। उसी से मेरा परिवार चलता है, इसलिए मैं पहली प्राथमिकता पुलिस के काम को देता हूं। उसमें मैं कोई समझौता नहीं करता हूं, तो मेरी पेंटिंग और फोटोग्राफी दोनों छूटी। कविता चलती रही, क्योंकि मैं इसे कहीं भी लिख सकता हूं, फोटोग्राफी के लिए मुझे घूमना ही पड़ेगा, पेंटिंग के लिए मुझे बैठना पड़ेगा। उसमें दो घंटे भी लग सकते हैं पांच घंटे भी। इसके लिए समय निकालना पड़ेगा जो मैं नहीं निकाल सकता। इसलिए सिर्फ कविता चल रही है। दूसरी चीजें मैं नहीं कर पा रहा हूं और मुझे लगता है, कि उसे रिटायरमेंट के बाद ही कर पाउंगा। मेरे नाना थे रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी जो कि उर्दू के बड़े शायर माने जाते हैं। उनकी बायोग्राफी का काम कर रहे थे, वह भी यहां रुक गया। हम एक उपन्यास पर काम कर रहे थे वह भी रुक गया। बायोग्राफी, उपन्यास, आलेख, फोटोग्राफी, पेंटिंग मैं पुलिस के काम से समझौता करके नहीं कर सकता, क्योकि पुलिस महकमे से ही मैं जिंदा हूं, मेरी फैमिली जिंदा है। कविता बीच-बीच में निकल जाती है। मेरे कई साथी भी रुके हुए काम को पूरा करने के लिए बोलते हैं, मैं उन्हें भी यही जवाब देता हूं।
0- आपने बिहार में भी काम किया है, वहां और यहां में आप क्या फर्क पाते हैं?
00- बहुत फर्क है, वहां अब जातीयता का मुद्दा राजनीतिक हो गया है। वहां अब एसटीएससी, बैकवर्ड की बात कम हो गई है। वहां राजनीतिक जागरूकता लोगों में बढ़ी है। लोग शिक्षित हो रहे हैं। राजनीति में सब को साथ लेकर चलने का काम जो मायावती ने अभी किया है वहां काफी पहले से हो रहा है। वहां कोई ऐसी कास्ट नहीं है जो अपने बल पर चुनाव जीत सके । नक्सलवाद से इसे जोड़कर नहीं देखा जा सकता। वहां नक्सली लोकल मुद्दे लेकर लड़ाई लड़ रहे हैं। जैसे वे यहां पर फारेस्ट को लेकर जंग में उतरे। झारखंड में इन्होंने जमीन और मुआवजे की बात उठाई, लोगों को बहकाना शुरू किया कि आप को कुछ नहीं मिला और बाहर के लोग आकर यहां राज कर रहे हैं। वहां टाटा जैसी कंपनियां पहले ही आ चुकी थीं। इसलिए वे इस मुद्द को नहीं उठा सके। बिहार में ये भी नहीं बचा, तो वहां नक्सलियों ने इात को हथियार बनाया। नार्थ बिहार में बड़े-बड़े जमींदार हैं, जिनके पास 10-10 हजार एकड़ जमीनें हैं। वहां अमीरी गरीबी में बहुत बड़ी खाई है लेकिन वहां भी नक्सली कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं। वहां के गरीबों को उन्होंने जमींदारों द्वारा उनके ऊपर किए गए अत्याचार को लेकर उकसाने का प्रयास किया। लेकिन वहां के जमींदार अपने कर्मचारियों को बहुत ज्यादा सहयोग देते हैं, शादी-ब्याह में भरपूर सहयोग देते हैं, बीमार होने पर गाड़ी से पटना भिजवा देते हैं, इसलिए इनकी दाल वहां ज्यादा नहीं गल पाई। वहां पालिटिकलअवेयरनेस भी ज्यादा है, आप देखते होंगे पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो स्टेशन में सबसे ज्यादा चिट्ठी बिहार से ही आती है। वो भी किसी दूरदराज के छोटे से गांव से जिसमें वह राष्ट्रीय मुद्दे पर सवाल पूछता है। छत्तीसगढ़ में लोग बहुत सीधे हैं। गांवों में पालिटिकल अवेयरनेस न के बराबर है। अब धीरे-धीरे यह बढ़ रही है। जैसा कि रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग के आसपास के इलाकों में ही दिखाई देता है। इसका एक कारण और भी है, यहां अभी पढ़ने-लिखने को लेकर वो जागरूकता नहीं आई है जो बिहार में है। यहां प्राकृ तिक संसाधन भरपूर हैं, जो कि बिहार में नहीं हैं।
0- भारत सरकार से आप तत्काल दस बटालियन देने की मांग कर रहे हैं, केंद्रीय केबिनेट सेक्रेटरी से भी आप की बात हो चुकी है। क्या उम्मीद करते हैं, कब तक कितनी बटालियन मिल पाएगी?
00- गवर्नमेंट आफ इंडिया के लेबल पर भी अभी बटालियन की काफी तंगी है। हम यहां बैठकर काफी आसानी से मांग कर सकते हैं, लेकिन मैं वहां भी रहा हूं, इसलिए जानता हूं कि उनके सामने क्या परेशानी है। अभी चार राज्यों में चुनाव होने हैं, चुनाव आयोग ने उन्हें अलर्ट कर रखा है। शार्ट नोटिस पर उन्हें फोर्स को डायवर्ट करना पड़ेगा। केंद्र की यह सबसे बड़ी परेशानी है। वहां के सभी अधिकारी अच्छी तरह जानते हैं कि नक्सलियों के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई यहां चल रही है और मदद भी देना है। लेकिन फोर्स कहां से निकालें? उन्हें लगता है कि कहीं फोर्स भेजें और 15 दिन में उसे वापस न बुलाना पड़े। मुझे ऐसा लगता है कि बड़ी संख्या में ना सही , लेकिन 4-5 बटालियनें तो हमें जल्द मिलेंगी।
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