'बुनियादी काम नहीं कर पा रही है पुलिस'


 
( रायपुर, 15 जनवरी 2008, दोपहर 2 बजे )

प्रदेश पुलिस की कमान संभाल रहे डीजीपी विश्वरंजन सिर्फ पुलिसवाले नहीं हैं, उनके अंदर एक कवि, साहित्यकार, फोटोग्राफर, पेंटर और एक उपन्यासकार भी छुपा हुआ है। हालांकि वे अभी पुलिस की नौकरी के अलावा सिर्फ अपने कवि को ही जिंदा रख पा रहे हैं। पुलिस के कामकाज को उन्होंने काफी लंबे समय से काफी करीब से देखा है और उसकी समस्याओं को अच्छी तरह से जानते हैं। राज्य में पुलिस वालों की संख्या में कमी उन्हें खटकती है और वे बताते हैं कि इस समस्या को नई भर्तियों के जरिए क्रमश: दूर किया जा रहा है। विश्वरंजन का मानना है कि राजनीतिक दबाव में आना-न आना अफसर के चरित्र पर निर्भर करता है। अगर अफसर गलत काम करेगा तो वह दबेगा भी। जो सही काम करेगा, वह अड़ेगा और अपनी पहचान बनाएगा। कानून व्यवस्था बनाने में जनता के योगदान को वे अच्छी तरह समझते हैं और इसके लिए उनकी पुलिस काम भी कर रही है। राज्य के पुलिस प्रमुख विश्वरंजन से नेशनल लुक के लिए बबलू तिवारी ने लंबी चर्चा की। प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

0- गत दिनों हुए सुहैला कांड के पीछे आप क्या कारण पाते हैं? इसमें यह बात भी सामने आई है कि जिस सरपंच को गांव वालों ने मारकर जिंदा जलाया उसके खिलाफ वहां के लोकल थाने में बहुत सी शिकायतें थीं। उसका नाम थाने के निगरानी शुदा बदमाशों की लिस्ट में भी था। जिस दिन की घटना है, उस दिन वहां नाचा के दौरान थाने के दो सिपाही भी सुबह तक उपस्थित थे। पुलिस के पास इतनी जानकारी होने के वावजूद वह पहले से बचाव की कार्रवाई क्यों नहीं पाई? जनता क्यों कानून को अपने हाथ में लेने लगी है?
00- पुलिस बल की कमी एक बहुत बड़ा कारण है जिसके चलते बहुत सी बातों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है-जैसे वीसीएनबी यानी विलेज क्राइम नोट बुक। एक समय था जब गांव में गश्त लगती थी और उसकी एक रूटीन थी कि महीने में इतनी गश्त लगेगी इतने गांवों में लगेगी। गश्त के दौरान थानेदार उन गांवों में वीसीएनबी लेकर जाता था और बैठकर मिलान करता था कि यहां पर बदमाश कौन है, किन पर भरोसा किया जा सकता है, किन पर नहीं किया जा सकता, यहां की लोकल समस्याएं क्या हैं, यहां कोई झगड़ा तो नहीं होने वाला है। पिछले 12-15 साल से यह प्रक्रिया कम हो गई है, या बंद हो गई है। इसके पीछे कारण है कि पिछले कई सालों से पुलिस में भर्ती नहीं हुई, जिससे थानों में जो बल था वह आधा हो गया है। जिसकी वजह से गांवों में गश्त बंद हो गई। अब किसी गांव में जब कोई घटना होती है, तभी थानेदार वहां जा पाता है, उस समय गांव के बारे में उसे उतनी जानकारी नहीं मिल पाती है। पुराने जमाने में में गांवों में उजली और अंधेरी रात में किस तरह गश्त लगेगी यह निर्धारित होता था। दूसरी चीज, इस बीच गांवों की आबादी भी बढ़ी उसकी अपेक्षा पुलिस का अनुपात कम होता गया। पुराने हिसाब से थाने का बल और बढ़ना चाहिए था, वह भी नहीं हुआ। हम प्रयास कर रहे हैं कि पुलिस में जो पुराना नियम था उसे फिर चालू किया जाए। इसमें समस्याएं भी बहुत सारी हैं, क्योंकि अभी फोर्स उतनी नहीं है कि हम उस तरह की गश्त कर पाएं। इसके लिए हमने बोला है कि इसमें जनता का सहयोग लीजिए। ग्राम रक्षा दल बनाने की कोशिश कीजिए। ताकि पुलिस को तुरंत जानकारी मिल सके। जहां तक सुहैला कांड का सवाल है, वहां रात में नाचा कार्यक्रम के दौरान दो सिपाही थे, उन्होंने रात में हुए झगड़े को शांत करा दिया। उन्हें लगा कि सब ठीक हो गया, वो इस बात का अंदेशा नहीं लगा पाए कि कल फिर यह झगड़ा तूल पकड़ सकता है। जांच में इस बात का पता लगाने के लिए कहा गया है कि दोनों सिपाहियों ने थाने में आकर रात की घटना की जानकारी दी थी कि नहीं?
पुराने जमाने में सिपाहियों को इंफार्मेशन नोट बुक और आब्जर्वेशन नोट बुक दी जाती थी। इंफार्मेशन नोटबुक में वह वीएसएनबी से जानकारियां नोट करके रखता था। जब भी वह गांवों में किसी काम से जाता था तो वह नई जानकारियां नोट करके लाता था। उसमें यह भी जानकारी रहती थी कि अगर मर्ग हो गया है तो इसकी सूचना किसे देनी है, किससे संपर्क करना है, किससे गांव में हो रही गतिविधि के बारे में जानकारी लेनी है। अब यह चीज बंद हो गई है। आब्जर्वेशन नोट बुक में वह खुद के अध्ययन के हिसाब से जानकारियां नोट करके लाता था। यह भी अब खत्म हो गया है। मप्र के दिनों में भी यह बंद हो गया था, लेकिन उसकी जगह सिपाही एक नोटबुक रखते थे और उसमें जानकारियां नोट करके लाकर थानेदार को दिखाते थे। थानेदार उस पर दस्तखत करता था और जरूरी जानकारी वीसीएनबी में दर्ज कर लेता था और अपने हिसाब से कार्रवाई करता था। ये सब चीजें आज से 22 साल पहले जब मैं यहां था तब चालू थीं, अब आकर पता चल रहा है कि ये सब खत्म हो चुकी हैं। एक तीसरी चीज और उस समय थी कि एसपी अपने हाथ से क्राइम डायरी भरता था। अब वह क्राइम डायरी नहीं भरता, डीएसपी और एसडीओपी भरते हैं। क्राइम डायरी नहीं भरने की वजह से एसपी को यह पता नहीं चल पाता कि कहां क्या चल रहा है, उसे बड़ी घटनाएं ही मालूम हो पाती हैं। क्राइम डायरी भरने से एसपी को एक नजर में पता चल जाता था कि किस-किस थाने में क्या प्राब्लम चल रही है, किस-किस तरह के अपराध हो रहे हैं। उसे यह भी पता लग जाता था कि कौन सा थानेदार सही काम कर रहा है, कौन सा थानेदार तफ्तीश में अच्छा है, कौन लॉ एंड आर्डर सही तरीके से संभाल लेता है, कौन इंवेस्टिगेशन अच्छा करता है। इसके हिसाब से वह जरूरत पड़ने पर उन थानेदारों को काम के मुताबिक इस्तेमाल कर लेता था। थानों में एसपी तीन-तीन दिन का निरीक्षण करते थे। अभी भी निरीक्षण हो रहा है, उसमें बहुत लंबा लिखा भी जा रहा है कि यह रिकार्ड ठीक नहीं है, उसे दुरुस्त करने के लिए मेमो भेज दिया जाता है। लेकिन उन दिनों एसपी थाने में ही बैठकर रिकार्ड ठीक कराता था। रजिस्टर नहीं भरा है, वीसीएनबी में नोट नहीं पड़ा है, सब ठीक करवाता था। इसके बाद वहां एक सम्मेलन होता था, जिसमें एसपी थाने में पूरे स्टाफ को बुलाता था और प्रत्येक से इलाके में बारे में उसकी जानकारी लेता। इसमें जो पुलिसकर्मी इलाके में बारे में काफी जानता था उसे रिवार्ड भी दिया जाता था और जो कम जानता था उसे सजा। अब इसका स्वरूप बदलकर यह हो गया है कि पुलिसकर्मियों से उनकी समस्याएं पूछी जाती हैं, यह भी ठीक है, लेकिन हम पुराने स्वरूप को वापस चालू करने का प्रयास कर रहे हैं। सुहैला कांड का असल भी यही है कि अगर थाने में वीसीएनबी भरा गया होता और किसी ने उसका निरीक्षण किया होता तो उसे पता चल जाता कि सुहैला में यह झगड़ा लंबे समय से चल रहा है। उसमें थानेदार पहला काम करता कि प्रो-एक्टिव एक्शन लेता। पुलिस भेजकर वर्तमान स्थिति की जानकारी लेता। हम बुनियादी पुलिसिंग को भूल रहे हैं। हम त्वरित पुलिसिंग की ओर बढ़ रहे हैं । यहां समस्या है, यहां फोर्स लगा दो, यहां घटना हुई है, यहां इंवेस्टिगेशन कर लो। जब तक हम बुनियादी पुलिसिंग नहीं करेंगे, तब तक हम बहुत सारी चीजों को कंट्रोल नहीं कर पाएंगे। यह हमारे लिए और भी जरूरी हो गया है क्योंकि स्टाफ कम हो गया है, आबादी बढ़ रही है, राजधानी बन गई है, नए इलाके बढ़ रहे हैं, नए लोग आ रहे हैं, उनके साथ नौकर-चाकर आ रहे हैं, नए कारखाने खुल रहे हैं, उनमें काम करने के लिए लोग आ रहे हैं। वीसीएनबी चालू होने से उसमें कुछ तो भरा जाएगा, जैसे उस इलाके में कितने सजायफ्ता है, किसे कौन सी सजा हुई है, कौन निगरानीशुदा बदमाश है, कितनी बार चोरी हो चुकी है, कौन किस अपराध में लिप्त है इसकी जानकारी मिल सकेगी। इसे चालू नहीं करने से हो सकता है कि हम बड़ी-बड़ी चोरी, डकैती पकड़ लें, लेकिन रोजमर्रा के क्राइम को हम कंट्रोल नहीं कर पाएंगे। बुनियादी चीजों में बहुत मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन इससे पुलिस के पास हर इलाके की पूरी तस्वीर होती है। सुहैला कांड में जाति की समस्या भी सामने आई है। जाति की समस्या सिर्फ पुलिस नहीं सुलझा सकती। ये जाति की समस्या थी। बिहार में हम रहे हैं हम जानते हैं कि जाति संघर्ष कितना खतरनाक होता है। विदेशों में काउंटी पुलिसिंग में इसका बहुत अच्छा समाधान है, वहां पंचायतों का अपना थाना है, वह खुद ही पुलिसकर्मियों की भर्ती करती हैं। एक थाने में 5-10 पुलिसकर्मी होते हैं। थाने का हेड भी वहीं का लोकल होता है, उसे अच्छी तरह से पता होता है कि गांव में क्या चल रहा है। उस पर जिम्मदारी भी होती है, क्योंकि वह सही काम नहीं करेगा तो पंचायत उसे निकाल देगी। हमारे यहां यह इसलिए नहीं हो सकता कि ना तो यहां की पंचायतों में उतनी पारदर्शिता है और न ही उतना पैसा। हमारे यहां रूरल थानों के क्षेत्र में 50-100 गांव आते हैं, जहां बराबर जा पाना फोर्स की कमी के कारण संभव नहीं है। इसके उपाय के रूप में हमारे पास कोटवार सिस्टम था, जो कि अभी भी है, लेकिन इसमें अब समस्या ये हो रही है कि हम जो जानकारी उससे ले पाते थे अब नहीं ले पा रहे हैं। क्योंकि कोटवार भी अब गांव की अंदरूनी राजनीति का हिस्सा बन जा रहा है। वह उसी गांव का रहने वाला होता है, इसलिए वह अपने फायदे-नुकसान के हिसाब से पुलिस को जानकारी देता है। उसको मिलने वाला मानदेय भी ना के बराबर ही है। दूसरा पुलिस गांव में फोर्स की कमी की वजह से नहीं जा पा रही है। पुलिस गांव के आसपास होने वाले क्राइम में ही उलझी रहती है जिससे बुनियादी पुलिसिंग नहीं हो पा रही है। हमने कहा है कि कम से कम वीसीएनबी का रिकार्ड दुरुस्त कर लिया जाए ताकि कोई जब गांव में जाए तो वीसीएनबी पढ़कर जाए,जिससे उसे उस गांव के बारे में जानकारी रहे। अगर पुलिस वीसीएनबी पढ़ने लगेगी तो वह भरना भी शुरू कर देगी।
जहां तक एसपी के तीन दिन के निरीक्षण का सवाल है उसका भी हल निकाला जा सकता है। हमने बोला है कि आप थानों का निरीक्षण करें, एक साथ तीन दिन रुकने की बजाय आप एक-एक दिन निरीक्षण कर सकते हैं, थानेदार को निरीक्षण के बाद बोल दीजिए कि फलां-फलां रिकार्ड ठीक नहीं है, इसे दुरुस्त करवाएं हम दोबारा आकर देखेंगे। शहर की बात छोड़ दीजिए तो रूरल थानों में तो इसे किया ही जा सकता है, एसपी की जगह एसडीओपी और डीएसपी भी निरीक्षण कर सकता है, दरअसल होता यह है कि एक बार आदत छूट जाने के बाद उसे वापस लाने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। हमारे जमाने में हम लोग रोज दिन की शुरुआत ही क्राइम डायरी लिखने से करते थे। सुबह सात बजे से 8 -9-10 बजे तक डायरी लिखते थे फिर तैयार होकर आफिस जाते थे। यह आदत में शामिल था। उस समय दो दिन परेड होती थी- मंगलवार और शुक्रवार। आप हफ्ते में दो दिन लाइन में जाते थे तो मालूम रहता था कि वहां क्या हो रहा है। सिपाहियों से बात करते थे तो पता चलता था कि उन्हें क्या समस्या है। जब हम यह सब कुछ छोड़ देंगे, तो समस्याएं होंगी ही। अब फोर्स कम है, और वही लोग रात में डयूटी करके आए रहते हैं तो सुबह आप किसकी परेड लेंगे। चार आदमी की परेड तो लेंगे नहीं। अब ये हो रहा कि परेड न होने की वजह से अधिकारी लाइन ही नहीं जाते हैं। हमने कहा है कि आप बगैर काम के ही रोज लाइन में जाकर एक-दो घंटे बैठिए। इसी बहाने आप कर्मचारियों से बात करेंगे, आप को पता चलेगा कि उसे रोजमर्रा या अन्य वजह से क्या परेशानी हो रही है, जिसका उसकी कार्यक्षमता पर असर पड़ रहा है। जहां तक जनता का कानून हाथ में लेने का सवाल है उसमें कई बातें होती हैं, पहली कि जब कोई चीज गांव में उबल रही है, और पुलिस को उसकी जानकारी नहीं होती है तो उसको संभालने के लिए आपको बहुत सख्ती करनी पड़ती है। अगर पुलिस इस वजह से सख्ती नहीं करती है कि वह संभाल लेगी, तब आप संभाल नहीं पाते हैं, यह बहुत संभव है। दूसरी यह कि यह स्थिति आई क्यों इसके लिए मैंने बताया ही कि मौलिक पुलिसिंग नहीं होने से थाने को यह पता ही नहीं चलता कि गांव में चल क्या रहा है। इसके साथ ही इसका राजनीतिक कारण भी होता है, जिसमें ऐसी चीजें कराई जाती हैं। चुनाव के आसपास इसका ग्राफ बढ़ जाता है। यह मामला इससे अलग है, यहां पुलिस यह अनुमान नहीं लगा पाई कि छोटी सी घटना कितना बड़ा रूप ले लेगी। अनुमान आप तभी लगा पाएंगे जब आपको पता होगा कि गांव ऐसे कौन से लोग हैं जो ऐसा काम कर सकते हैं, या फिर जो लोग गांव में इकट्ठा हुए हैं वे क्या करेंगे। इसलिए मैं कहता हूं कि जब तक पुलिस बुनियादी पुलिसिंग नहीं करेगी, तब तक समस्या का निदान नहीं हो सकता। हम सिर्फ समस्या खड़ी कर रहे हैं आज के लिए, कल के लिए।

0- फोर्स की कमी शहर-गांव के थानों में बनी हुई है, उसके लिए क्या किया जा रहा है, अभी थानों में जो फोर्स के स्वीकृत पद हैं वह 1992 की आबादी के हिसाब से हैं, क्या इसमें भी बढ़ोतरी की गई है? भर्ती के साथ क्या इस पर ध्यान दिया जा रहा कि फोर्स का दुरुपयोग अफसरों व नेताओं के बंगलों पर न हो?
00- राज्य सरकार ने पुलिस फोर्स को 21 हजार से बढ़ाकर 42 हजार कर दिया है। इसमें डीएफ, सीएएफ, एसटीएफ और एटीएस भी शामिल है। खाली पदों को भरने के साथ ही आबादी के हिसाब से थानों का बल बढाया भी गया है। चूंकि काफी लंबे समय से भर्ती हुई नहीं है, इसलिए इतनी बड़ी संख्या में भर्ती की नहीं जा सकती। दूसरी समस्या यह है कि अगर हम एक साथ भर्ती कर भी लेते हैं तो हम हवलदार-एएसआई कहां से लाएंगे। हम सिपाही और सब इंसपेक्टर के पदों पर ही भर्ती करते हैं। ऐसे में सिपाही और हवलदार को लीड कौन करेगा। इतने पदों पर एक साथ ट्रेनिंग की समस्या भी है। हम अभी स्टेप-टू-स्टेप भर्ती कर रहे हैं, ताकि हवलदार-एएसआई की कमी ना हो पाए। मेरा मानना है कि अगले दो साल में हम रूरल थानों में फोर्स की कमी को पूरा कर लेंगे। अभी तक करीब 5 हजार पदों पर भर्ती हो चुकी है।
दूसरी चीज फोर्स के दुरुपयोग की जो है उसमें एक सुरक्षा ढांचा बना हुआ है कि किस अफसर के यहां कितना बल तैनात रहेगा। हमारी समस्या यह हो रही है कि जब राज्य बना था तो अफसर व वीआईपी के लिए जो ढांचा बनाया गया था उसमें अब बढ़ोतरी हो गई है। अब वीआईपी और अफसर बढ़ गए हैं और बल उतना ही है। इसलिए इसमें मिस-यूज नहीं होता। अगर होता है तो इसके लिए दूसरे कारण हैं, जैसे अगर कोई एसपी डीएफ के जवानों को अपने हिसाब से बंगलों पर तैनात करता है तो इसका पता हमें नहीं चल पाता है। क्योंकि डीएफ एसपी के अधीन रहता है। जब ऐसे मामलों का पता चलता है तो उस पर कार्रवाई भी होती है। हालांकि सीएएफ का दुरुपयोग एसपी भी नहीं कर पाता है क्योंकि जवान के परेड इंसपेक्शन के समय तथा डयूटी बुक में वह नोट हो जाती है। हमने 40-50 सीएएफ के जवानों को बंगलों से हटाया है, इन्हें पीएचक्यू में रखा गया है, जो कि लॉ एंड आर्डर के समय जिला पुलिस की मदद करते हैं। सीएएफ का दुरुपयोग हम रोक रहे हैं। डीएफ का हमें पता नहीं चल पाता है, अगर पता चल जाता है तो दबाव तो डाला जा सकता है।

0-
कम्युनिटी पुलिसिंग के लिए प्रदेश में क्या काम किया जा रहा है?

00- शहरों में हम हर मोहल्ले में कमेटी बनाने की धीरे-धीरे शुरुआत कर रहे हैं। यह कमेटी स्थायी नहीं रहेगी, हर दो महीने में इसके सदस्य बदलते रहेंगे ताकि किसी भी तरह से इसमें घालमेल ना किया जा सके। देखा गया है कि कमेटी के लोग पुलिस से मिल जाते हैं या एक समुदाय या गुट के लोग कमेटी से जुड़ जाते हैं जिससे पुलिस को कोई फायदा नहीं मिल पाता है। इससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को पुलिस से जुड़ने का मौका भी मिलेगा। इसको शुरू करने के लिए मीटिंग रखी गई है। अभी इसे हम बिलासपुर-रायगढ़ समेत चार शहरों में प्रायोगिक रूप में शुरू कर रहे हैं, ताकि इसमें अगर कोई सुधार करने की जरूरत पड़े तो उसे किया जा सके। फिर इसे सभी जिलों में चालू किया जाएगा। गांवों में ग्राम रक्षा दल बनाने के लिए थानेदारों को कहा गया है। हालांकि सभी गांवों में बनाना संभव नहीं है, लेकिन सेंसेटिव गांवों में रक्षा दल बनाना थानेदारों के लिए अनिवार्य किया गया है।

0- भारत में कौन से स्टेट की पुलिस आपको अच्छी लगी और क्यों? छत्तीसगढ़ पुलिस वैसा बनने के लिए क्या कर रही है?
00- देखिए यह ऐसा प्रश्न है कि आप किस हिसाब से देखते हैं। अगर क्राइम कंट्रोल के हिसाब से देखें तो महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, आंध्रा, कर्नाटक की पुलिस बहुत प्रोफेशनल है। इनका रिस्पांस टाइम काफी अच्छा है। इनके पास फोर्स अधिक है। ट्रेनिंग स्कूल्स अच्छे हैं। राज्य सरकारें पुलिस बजट पर काफी पैसा खर्च करती हैं। नार्थ इंडिया में फोर्स की कमी शुरू से रही है। मप्र पुलिस 15-20 साल पहले बहुत अच्छी मानी जाती थी। यहां पर एसपी के लेबल पर पब्लिक रिस्पांस काफी अच्छा था। इसका कारण भी मैंने खोजा है, यहां चूंकि रजवाड़े होते थे, इसलिए एसपी यह रिस्क नहीं लेता था वह किसी से ना मिले, ना जाने कौन किस राजा का आदमी हो। सत्तर के दशक में भी आधी रात को फोन करने पर एसपी फोन उठाते थे। आज जितने भी एडवांस स्टेट हैं वहा कमिश्नरी सिस्टम लागू है। कमिश्नरी सिस्टम में पुलिस के पास फंड भी अधिक होता है और पॉवर भी। उनके पास मजिस्ट्रेट के अधिकार भी रहते हैं। जबकि छग, मप्र, राजस्थान, यूपी, बिहार, उड़ीसा आदि में यह सिस्टम नहीं है। वहीं महाराष्ट्र, तमिलनाडु , केरला,आंध्रा, कर्नाटक, कलकत्ता में यह शुरू से है। इन राज्यों को यह बात जल्दी समझ में आ गई कि अगर राज्य को विकास करना है तो वहां की कानून व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त रखनी होगी। इसके लिए पुलिस पर खर्च अधिक करना होगा।

0- बंगलौर सहित कुछ जगहों में जनता सीधे पुलिस से शिकायत करने के बजाय वहां तैनात स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं को अपनी शिकायत दर्ज कराती है। इसे पुलिस द्वारा जनता के साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार को कम करने के लिए किया गया है॥ यहां ऐसा कुछ किया जा सकता है क्या?
00- यह काम कई जगह किया जा रहा है, इसकी शुरुआत तमिलनाडु कैडर के आईपीएस अफसर फिलिप्स ने की थी। पुलिस फ्रेंड्स आज कई राज्यों में काम कर रहे हैं, हालांकि ये साधारण मामलों को सुलझाने का प्रयास करते हैं, जब मामला उनसे नहीं संभलता तो वो इसे पुलिस के पास ट्रांसफर कर देते है। मेजर अफेंस में पुलिस सीधे कार्रवाई करती है। केरला, तमिलनाडु, आंध्रा में इस पर काम हो रहा है। पंजाब में टेरेरिज्म के बाद दूसरे टाइप से इस पर काम करने का प्रयास किया गया। लखनऊ में कोशिश की जा रही है। फ्रेंड्स पुलिस में पुलिस कम्युनिटी के पास नहीं जाती है, बल्कि कम्युनिटी ही पुलिस के पास जाकर कहती है कि वह उनकी मदद करना चाह रही है। पुलिस फ्रेंड्स पर पिछले दस साल में बहुत सारा काम हुआ है। हम यहां कम्युनिटी के पास जाकर कमेटी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। धीरे से यहां भी लोग पुलिस की मदद के लिए सामने आएंगे।

0- महिला थाने में पारिवारिक प्रकरणों को सुलझाने के लिए जो काउंसिलिंग की व्यवस्था की गई है उसे आप कितना सफल पाते हैं?
00- मैं इसे बहुत ज्यादा सफल नहीं पाता हूं, क्योंकि ज्यादातर मामलों को सुलझाने में टीम सफल नहीं हो पाती। इसके पीछे पुरुष और महिला के बीच फर्क और दहेज की व्यवस्था कारण हैं। आदमी महिला को अपने बराबर मानने को तैयार नहीं होता। महिलाएं शिक्षित हो रही हैं तथा अपना अधिकार मांगती हैं, तब विवाद पैदा होता है। इस समस्या को कोई भी काउंसलर सुलझा नहीं सकता क्योंकि घर जाते ही दोनों का एटीटयूड पहले जैसा हो जाता है। दहेज से संबंधित मामलों में काउंसिलिंग टीम को जरूर सफलता मिल रही है।

0- राजनेताओं द्वारा आए दिन पुलिस अफसरों को धमकाने की खबरें मिलती रहती हैं, पुलिस अफसरों पर नेता दबाव बनाकर मनमाफिक काम करवाते हैं, ना कहने पर उन्हें दंडित करवाने के लिए कहा जाता है, इसे आप किस तरह से लेते हैं?
00- यह समस्या नेता या अधिकारी की नहीं है, इसके पीछे सामाजिक परिवेश कारण है। यह सामंतवाद के शक्ति विखंडन से निकली है। जो चीज आप नेता के लिए बोल रहे हैं वह अधिकारी पर भी लागू होती है। अब शक्ति नेता और अधिकारी के पास आ गई है। दबाव में वही अफसर आते हैं जो खुद कानून से खेलने लगते हैं और करप्ट होते हैं। जो अफसर खुद दस गलत काम करेगा, तो वह दबाव में आएगा ही। इसका मतलब नेता और पुलिस से नहीं है, इसका सीधा मतलब आप की ईमानदारी से है। जब आप दस गलत काम करेंगे, तो दूसरे को कैसे मना कर सकते हैं। अगर आपने अपने नीचे गङ्ढा खोदकर रखा है तो आप लड़ेंगे कैसे, लड़ेंगे तो गङ्ढे में गिरेंगे जरूर। आप अगर ईमानदार हैं तो कार्रवाई कीजिए, कोई दबाव बनाता है तो उसे समझाइए और अपनी बात पर अड़िए। कोई भी आप का ज्यादा से ज्यादा क्या कर सकता है, ट्रांसफर । जहां नई जगह जाएं वहां भी ईमानदारी से काम करें, कितनी बार आपका ट्रांसफर किया जा सकता है, एक-दो-तीन-चार बार। अफसर को अपनी पर्सनालिटी खुद बनानी होती है। दबाव में वही आते हैं जिनकी गलती कोई दूसरा पकड़ लेता है। इसमें एक बड़ा रोल जिले के एसपी का भी होता है, अगर एसपी ईमानदार और दबाव में नहीं आने वाला है, तो इसका असर उसकी पूरी टीम पर पड़ता है। अन्यथा पूरी टीम भी उसके जैसी ही हो जाती है, क्योंकि वह ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारी के काम में भी दखल डालता है।

0- छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के खिलाफ इतनी बड़ी लड़ाई जा रही है, इस दौरान यह देखा जा रहा है कि कई पुलिसकर्मियों पर फर्जी इनकाउंटर के मामले दर्ज हो रहे हैं, अंबिकापुर की घटना इसका ताजा उदाहरण है, जिसमें पुलिस अधिकारी को इनामी नक्सली का इनकाउंटर करने पर पदोन्नति के साथ राष्ट्रपति पदक भी प्रदान किया गया था और उसी इनकाउंटर के लिए उस पर 302 का मामला कायम किया गया है, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
00- देखिए अंबिकापुर का मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए मैं इसपर नहीं बोलूंगा। मेरा मानना है कि अगर इनकाउंटर फर्जी है तो गलत है। पुलिस का अधिकार कानून के अंदर ही है। जब भी पुलिस कानून के दायरे से बाहर जाती है तो वह खुद ही गैरकानूनी हो जाती है। बहुत जगह देखा जा रहा कि जहां नक्सलवाद या आतंकवाद है, वहां ये लोग एक ग्रुप खड़ा कर देते हैं जो हर इनकाउंटर को फर्जी साबित करने का प्रयास करता है। अगर आप दस आदमी को गवाह के रूप में खड़ा कर देते हैं तो मुकदमा तो कायम हो जाएगा लेकिन मुकदमा कायम होने का यह मतलब नहीं है कि आप दोषी साबित हो गए। अगर आपका इनकाउंटर सही है तो कोर्ट से आपका छूटना निश्चित है। रही बात विभाग के सपोर्ट करने की तो विभाग जिस इनकाउंटर में संशय की स्थिति नहीं होती उसमें पूरी मदद करता है। लेकिन जिसमें संशय होता है उसमें एक सीमा तक ही किसी का साथ दिया जा सकता है। देश में कई मामले अधिकारियों द्वारा अपने फायदे के लिए फर्जी इनकाउंटर करने के सामने आए हैं। अब अगर कोई अधिकारी ऐसा करता है तो उसे कैसे रोका जा सकता है? हर जगह तो सीनियर अधिकारी उपस्थित होता नहीं है। जहां-जहां भी आतंकवाद या नक्सलवाद है, वहां यह समस्या सामने आ रही है, ऑल इंडिया लेबल पर भी इस पर विचार किया जा रहा है, लेकिन समस्या यह है कि हम किस आधार पर कह सकते हैं कि फर्जी इनकाउंटर नहीं होंगे। इसलिए हर इनकाउंटर के बाद उसकी मजिस्ट्रेट जांच कराई जाती है। अंबिकापुर वाले मामले में कोर्ट मजिस्ट्रेट जांच को नहीं मान रही है। डिपार्टमेंट ज्यादातर मामलों में अधिकारी का साथ देता है, उस समय तक उसे पगार भी मिलती है। कोर्ट यह नहीं कहता है कि आपने फर्जी इनकाउंटर किया है, कोर्ट का कहना यह रहता है कि उसके पास ये-ये प्रमाण मिले हैं, जिसमें प्रथम दृष्टया फर्जी इनकाउंटर होना पाया जाता है। फिर आप का काम होता है कि आप इसे झूठा साबित करें और जीतने के बाद डैमेज क्लेम भी कर सकते हैं।

0- बस्तर में इतने बड़े स्तर पर फोर्स तैनात की गई है, लेकिन वहां जो पुलिसकर्मी काम कर रहा है उसे ऐसा लगता है कि वह पनिशमेंट में वहां भेजा गया है। कुछ अधिकारी और नेताओं को बार-बार यह कहते भी देखा जाता है कि वह अधिकारी का ट्रांसफर बस्तर में करवा देगा। इसे आप किस नजरिए से देखते हैं?
00- देखिए यह यहां की घबराहट है, लेकिन जब आप लड़ाई के मैदान में कूद जाते हैं तो घबराहट नहीं रहती। इसका मैं उदाहरण देता हूं, अभी जो 12 पुलिसवाले मरे हैं वे लोग अपने एक मलेरिया पीड़ित साथी को पहुंचाने के लिए 35 जवानों की एक टोली में रवाना हुए थे। रास्ते में उन पर नक्सलियों ने अटैक कर दिया। 12 पुलिसकर्मियों ने बाकी साथियों को उसे लेकर जाने के लिए कहा। उन बारह लोगों को अच्छी तरह से पता था कि वे रुक रहे हैं तो उनकी मौत होनी निश्चित है, लेकिन फिर भी वे रुके, इससे पता चलता है कि फोर्स का मनोबल कितना ऊंचा है। यहां से पुलिसकर्मियों को जाते समय बुरा लगता है लेकिन वहां पहुंचने के बाद वह मोरल डाउन करके रह ही नहीं सकता है। रही बात पनिशमेंट की तो पुलिस का जवान लड़ने के लिए ही होता है, उसे इसे पनिशमेंट के रूप में नहीं लेना चाहिए।

0- आंध्र प्रदेश में जिस तरह से नक्सलियों से मोर्चा ले रही पुलिस को सुविधाएं मिल रही है, वैसा हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं? क्या हम फोर्स को आंध्र प्रदेश की तरह बैक सपोर्ट दे पा रहे हैं?
00- वेतन के मामले में हम भी आंध्र प्रदेश की तर्ज पर काम करने जा रहे हैं, एसटीएफ की सैलरी में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। डीएफ के जो जवान सघन नक्सल इलाके में हैं उनकी सैलरी 20 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्र में तैनात जवानों के वेतन में 15 प्रतिशत इजाफा करने का प्रस्ताव पास होने के लिए राज्य सरकार के पास भेजा गया है जो कि जल्द ही मंजूर हो जाएगा। रही बात संसाधन की तो जवानों को लगभग सभी जरूरी चीजें उपलब्ध कराई गई हैं, लेकिन देखा गया है कि जवान बुलेट प्रूफ जैकेट और टोपी भारी होने की वजह से नहीं पहनते हैं। यहां समस्या दूसरी है, नक्सलियों की मैन पॉवर ज्यादा है, वे लोग दंतेवाड़ा-बीजापुर के जंगलों में बराबर ट्रेनिंग कैंप चला रहे हैं, जिसमें झारखंड, आंध्रा, उड़ीसा , महाराष्ट्र आदि जगहों के 2 हजार के लगभग लोगों को 12 महीनों ट्रेनिंग दी जाती है। नक्सली 300 से ऊपर वाले पुलिस दल पर कभी हमला नहीं करते, वे 30-40 जवानों वाली टोली पर ही हमला करते हैं, बड़ी टोली के सामने से वे हट जाते हैं।

0- बस्तर में आप 22 साल पहले रहे हैं, आज के बस्तर को भी आप देख रहे हैं, वहां क्या बदलाव देखते हैं?
00- बस्तर में नक्सली प्राब्लम होने वाला है, इसकी जानकारी सबसे पहले शासन को हमने दी थी। सन 198 1 की बात है जब मैं एआईजी स्पेशल ब्रांच में था उस समय जानकारियां आने लगी थीं कि नक्सली उस इलाके में घूमने लगे हैं। ऐसा नहीं है कि उस समय मप्र में नक्सली नहीं थे, पहला नक्सली मप्र में 196 8 में पकड़ाया था भोपालपट्नम में। दूसरा 1971 में पकड़ाया था जगदलपुर में। उसके बाद मैंने पूरे बस्तर का दौरा किया। जंगलों में पत्रकार बनके घूमा, उस समय कोई आईडेंटिटी कार्ड नहीं देखता था। सुकमा, गोलापल्ली, भोपालपट्नम सहित पूरे इलाके का दौरा करके शासन को रिपोर्ट दी। उसके बाद मुझे वहां का एसपी बना दिया गया। उस समय आज की अपेक्षा बस्तर में पुलिस फोर्स बहुत कम था। कई थानों में मात्र 1-4 का ही बल था। फिर बहुत सारी फोर्स बढ़ाई गई। 198 2 में नई बटालियन बनाई गई। बस्तर डेवलपमेंट प्लान बना। मैं एसपी भी था और बटालियन का कमाडेंट भी। वहां पीटीएस खोला गया। जवानों को टे्रंड किया गया। उस समय कोंटा, गोलापल्ली, चिंतागुड़ा आदि इलाकों में नक्सलियों का मूवमेंट आधिक था। उस समय नक्सलियों ने ब्लास्ट करना शुरू नहीं किया था। चंद्रपुर में ब्लास्ट हो चुका था, आंध्रा में शुरू कर दिया था, लेकिन बस्तर में नहीं हुआ था। उस समय बस्तर बहुत शांत जगह थी। चारों तरफ हरियाली थी। मैंने अबूझमाड़ पैदल पार किया। उस समय वहां नक्सली नहीं थे। अब वहां दहशतभरा माहौल है।

फोटोग्राफी और पेंटिंग के लिए नहीं मिलता समय 

0- आप कवि-साहित्यकार भी हैं, पुलिस की व्यस्त जिंदगी में इसके लिए समय कैसे निकालते हैं?
00- मैं सिर्फ कवि और साहित्यकार नहीं हूं, मैं फोटोग्राफर भी हूं, पेंटिंग भी करता हूं । मेरी फोटोग्राफी और पेंटिंग छूट गई। मेरी पेंटिंग की बस्तर सहित कई शहरों में एक्जीबिशन भी लग चुकी है। अभी सिर्फ कविता के लिए ही समय निकाल पाता हूं। वो इस लिए कि इसके लिए अलग से समय नहीं निकालना पड़ता, क्योंकि कविता कहीं पर भी और कभी भी सूझ जाती है। गाड़ी में चलते-चलते सूझ गया और उसे लिख लिया। मैं उन लोगों में नहीं हूं जो नौकरी के समय तमाम दूसरे काम करते हैं। मुझे पैसा किसलिए मिलता है, पुलिस की नौकरी के लिए। उसी से मेरा परिवार चलता है, इसलिए मैं पहली प्राथमिकता पुलिस के काम को देता हूं। उसमें मैं कोई समझौता नहीं करता हूं, तो मेरी पेंटिंग और फोटोग्राफी दोनों छूटी। कविता चलती रही, क्योंकि मैं इसे कहीं भी लिख सकता हूं, फोटोग्राफी के लिए मुझे घूमना ही पड़ेगा, पेंटिंग के लिए मुझे बैठना पड़ेगा। उसमें दो घंटे भी लग सकते हैं पांच घंटे भी। इसके लिए समय निकालना पड़ेगा जो मैं नहीं निकाल सकता। इसलिए सिर्फ कविता चल रही है। दूसरी चीजें मैं नहीं कर पा रहा हूं और मुझे लगता है, कि उसे रिटायरमेंट के बाद ही कर पाउंगा। मेरे नाना थे रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी जो कि उर्दू के बड़े शायर माने जाते हैं। उनकी बायोग्राफी का काम कर रहे थे, वह भी यहां रुक गया। हम एक उपन्यास पर काम कर रहे थे वह भी रुक गया। बायोग्राफी, उपन्यास, आलेख, फोटोग्राफी, पेंटिंग मैं पुलिस के काम से समझौता करके नहीं कर सकता, क्योकि पुलिस महकमे से ही मैं जिंदा हूं, मेरी फैमिली जिंदा है। कविता बीच-बीच में निकल जाती है। मेरे कई साथी भी रुके हुए काम को पूरा करने के लिए बोलते हैं, मैं उन्हें भी यही जवाब देता हूं।

0- आपने बिहार में भी काम किया है, वहां और यहां में आप क्या फर्क पाते हैं?
00- बहुत फर्क है, वहां अब जातीयता का मुद्दा राजनीतिक हो गया है। वहां अब एसटीएससी, बैकवर्ड की बात कम हो गई है। वहां राजनीतिक जागरूकता लोगों में बढ़ी है। लोग शिक्षित हो रहे हैं। राजनीति में सब को साथ लेकर चलने का काम जो मायावती ने अभी किया है वहां काफी पहले से हो रहा है। वहां कोई ऐसी कास्ट नहीं है जो अपने बल पर चुनाव जीत सके । नक्सलवाद से इसे जोड़कर नहीं देखा जा सकता। वहां नक्सली लोकल मुद्दे लेकर लड़ाई लड़ रहे हैं। जैसे वे यहां पर फारेस्ट को लेकर जंग में उतरे। झारखंड में इन्होंने जमीन और मुआवजे की बात उठाई, लोगों को बहकाना शुरू किया कि आप को कुछ नहीं मिला और बाहर के लोग आकर यहां राज कर रहे हैं। वहां टाटा जैसी कंपनियां पहले ही आ चुकी थीं। इसलिए वे इस मुद्द को नहीं उठा सके। बिहार में ये भी नहीं बचा, तो वहां नक्सलियों ने इात को हथियार बनाया। नार्थ बिहार में बड़े-बड़े जमींदार हैं, जिनके पास 10-10 हजार एकड़ जमीनें हैं। वहां अमीरी गरीबी में बहुत बड़ी खाई है लेकिन वहां भी नक्सली कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं। वहां के गरीबों को उन्होंने जमींदारों द्वारा उनके ऊपर किए गए अत्याचार को लेकर उकसाने का प्रयास किया। लेकिन वहां के जमींदार अपने कर्मचारियों को बहुत ज्यादा सहयोग देते हैं, शादी-ब्याह में भरपूर सहयोग देते हैं, बीमार होने पर गाड़ी से पटना भिजवा देते हैं, इसलिए इनकी दाल वहां ज्यादा नहीं गल पाई। वहां पालिटिकलअवेयरनेस भी ज्यादा है, आप देखते होंगे पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो स्टेशन में सबसे ज्यादा चिट्ठी बिहार से ही आती है। वो भी किसी दूरदराज के छोटे से गांव से जिसमें वह राष्ट्रीय मुद्दे पर सवाल पूछता है। छत्तीसगढ़ में लोग बहुत सीधे हैं। गांवों में पालिटिकल अवेयरनेस न के बराबर है। अब धीरे-धीरे यह बढ़ रही है। जैसा कि रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग के आसपास के इलाकों में ही दिखाई देता है। इसका एक कारण और भी है, यहां अभी पढ़ने-लिखने को लेकर वो जागरूकता नहीं आई है जो बिहार में है। यहां प्राकृ तिक संसाधन भरपूर हैं, जो कि बिहार में नहीं हैं।

0- भारत सरकार से आप तत्काल दस बटालियन देने की मांग कर रहे हैं, केंद्रीय केबिनेट सेक्रेटरी से भी आप की बात हो चुकी है। क्या उम्मीद करते हैं, कब तक कितनी बटालियन मिल पाएगी?
00- गवर्नमेंट आफ इंडिया के लेबल पर भी अभी बटालियन की काफी तंगी है। हम यहां बैठकर काफी आसानी से मांग कर सकते हैं, लेकिन मैं वहां भी रहा हूं, इसलिए जानता हूं कि उनके सामने क्या परेशानी है। अभी चार राज्यों में चुनाव होने हैं, चुनाव आयोग ने उन्हें अलर्ट कर रखा है। शार्ट नोटिस पर उन्हें फोर्स को डायवर्ट करना पड़ेगा। केंद्र की यह सबसे बड़ी परेशानी है। वहां के सभी अधिकारी अच्छी तरह जानते हैं कि नक्सलियों के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई यहां चल रही है और मदद भी देना है। लेकिन फोर्स कहां से निकालें? उन्हें लगता है कि कहीं फोर्स भेजें और 15 दिन में उसे वापस न बुलाना पड़े। मुझे ऐसा लगता है कि बड़ी संख्या में ना सही , लेकिन 4-5 बटालियनें तो हमें जल्द मिलेंगी।


* DGP VISHWA RANJAN * CHHATTISGARH INDIA POLICE * NAXAL PROBLEM * BASTAR * COMMUNITY POLICING * DIRECTOR GENRAL OF POLICE * PUBLIC AND POLICE *

दिसंबर में अबुझमाड़ में घुसेगी पुलिस


अब पुलिस वार करेगी नक्सलियो पर

( 22 अक्टूबर 2007 को हिन्दी दैनिक नेशनल लुक में प्रकाशित)


बबलू तिवारी-रायपुर।

अगर केंद्रीय गृह मंत्रालय से पूरा सहयोग मिला तो दिसंबर से छत्तीसगढ़ पुलिस रेड कारीडोर के केंद्र अबुझमाड़ में हमले करना शुरू कर देगी। पीएचक्यू ने इसके लिए अपनी ओर से पूरी तैयारी कर ली है। केंद्र से नागा बटालियन के बदले मिलने वाली नई बटालियन के यहां पहुंचते ही आपरेशन शुरू कर दिए जाएंगे। आपरेशन की जिम्मेदारी आईजी गिरधारी नायक को सौंपी गई है।
पीएचक्यू सूत्रों के मुताबिक अबुझमाड़ में घुसने की तैयारी मुख्यालय ने 6 माह पहले ही पूरी कर ली थी, लेकिन केंद्र से हेलीकाप्टर समय से ना मिल पाने तथा नागा बटालियन की पुन: पदस्थापना ना हो पाने की वजह से इसे टाल दिया गया था। अब चूंकि हेलीकाप्टर केंद्र द्वारा उपलब्ध करा दिया गया है तो पीएचक्यू अपनी तैयारी को अंतिम रूप देने में लग गया है। हालांकि सूत्रों का कहना है कि पीएचक्यू आपरेशन के नेतृत्व के लिए सेना के अनुभवी अधिकारियों या नागा बटालियन के कुछ अफसरों को आपरेशन तक यहां पदस्थ करने की मांग केंद्र से कर रहा है।

एसटीएफ में 12 सौ से अधिक जवान 
राज्य के अलग-अलग नक्सल प्रभावित जिलों में इस समय स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) के 12 सौ से अधिक जवान नक्सलियों से मोर्चा संभाल रहे हैं। इनमें से करीब 200 को स्पेशल आपरेशंस में भी शामिल किया जा रहा है। इन सभी जवानों को कांकेर जंगलवार स्कूल में टे्रनिंग दी गई है। बताते हैं कि ये जवान जंगल में मोर्चा संभालने में दक्ष हैं। हालांकि कम से कम 6 माह तक नक्सली क्षेत्र में काम कर चुके जवान को ही आपरेशन के लिए सिलेक्ट किया गया है।
चप्पे-चप्पे का नक्शा
पीएचक्यू ने पूरी योजना का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया है। अबुझमाड़ के दुर्गम इलाकों के हवाई मैप के सहारे फोर्स के अटैक की रणनीति बनाई गई है। सूत्रों का कहना है कि तीन महीने पहले टोही विमान द्वारा खींचे गए फोटो में करीब दर्जन भर नक्सली कैंप की पहचान की गई है। जहां सबसे पहले हमला किया जाएगा। आपरेशन टीम की मदद के लिए अबुझमाड़ इलाके के जानकार एसपीओ की एक टीम भी शामिल की गई है। हालांकि सूत्रों का कहना है कि नक्शे से दुर्गम इलाकों में जाने वाले सभी मार्ग, रूकने के लिए सुरक्षित ठिकानों की पहचान कर ली गई है।
जिलों व राज्य की सीमाएं होंगी सील
सूत्रों का कहना है कि हमले के समय अबुझमाड़ से लगे प्रदेश के सभी जिलों व दूसरे राज्यों की सीमाओं को सील कर दिया जाएगा। इसके लिए पड़ोसी राज्यों की पुलिस से बात कर लिया गया है। बताते हैं कि नक्सलियों के ऊपर जब पुलिस ताबड़तोड़ हमला करना शुरू करती है तो वे समीपवर्ती राज्य की सीमा पार कर जाते हैं। इसके लिए डेढ़ माह पहले ही केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों व नक्सल प्रभावित राज्यों के पुलिस अधिकारियों के साथ पीएचक्यू में एक ज्वाइंट आपरेशन पर विचार-विमर्श किया गया था। जिसमें एक राज्य में होने वाले आपरेशन के दौरान दूसरों राज्यों द्वारा सीमाएं सील करने पर सहमति बनी थी।
जरूरी संसाधन तैयार
पीएचक्यू के रणनीतिकारों का कहना है कि जहां तक संभव होगा आपरेशन टीम को हेलिकाप्टर द्वारा ही टारगेट के आसपास ड्राप किया जाएगा। आपरेशन टीम नाइट वीजन डिवाइस, सेटेलाइट फोन, लैंड माइंस सर्च डिवाइस, बुलेटप्रूफ जैकेट आदि से लैस रहेगी। इसमें से ज्यादातर चीजें तो पुलिस के पास पहले से मौजूद हैं, लेकिन और मात्रा की खरीदी के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से अनुमति मांगी गई है।

नक्सलियो के ट्रेनिंग कैंपों पर पुलिस का हमला

( 17 मार्च 2008 को हिन्दी सांध्य दैनिक 'छत्तीसगढ़' में प्रकाशित)
 

रायपुर। छत्तीसगढ़ पुलिस ने नक्सलियों के बेस कैंपों पर हमला शुरू कर दिया है। दस दिन पहले दंतेवाडा-बीजापुर के जंगलों में सालभर चलने वाले ट्रेनिंग कैंपों पर ग्रे-हाउंड-एसटीएफ-सीआरपीएफ की टीम ने हमला किया था। उस समय टीम को आंशिक सफलता भी मिली थी। अभी पुलिस की तीन संयुक्त टीमें अबुझमाड़ में घुसी हुई हैं। बताते हैं कि दो संयुक्त टीम बीजापुर-दंतेवाड़ा के जंगलों में भी रवाना हुई हैं। बस्तर आईजीपी आरके विज ने ऐसे अभियान चलते रहने की जानकारी दी है। पुलिस मुख्यालय व बस्तर में नक्सल आपरेशन की कमान संभाल रहे अफसरों के मुताबिक इस समय तीन से अधिक संयुक्त टीमें अबुझमाड़ में घुसी हुईं हैं। प्रत्येक टीम में तीन सौ से अधिक फाइटर जवान हैं। हालांकि यहां नक्सलियों को उंचाई का फायदा मिल रहा है। पुलिस ने अभी आसान और कम पहाड़ी वाले इलाकों में स्थित नक्सली ठिकानों पर अपने आपरेशन को सीमित रखा है। बताते हैं कि पिछले दो तीन से चल रहे इस अभियान में पुलिस को काफी सफलता मिली है। इस बीच अबुझमाड़ से लगने वाले जिलों व रायों की सीमाओं की सील कर दिया गया है। सूत्रों का कहना है कि संभव है कि टीमें वापस लौटने की बजाय सीधे महाराष्ट्र सीमा तक निकल जाएं। पुलिस की दो वाइंट टीम दंतेवाड़ा-बीजापुर के जंगलों में भी घुसी हैं। बताते हैं कि यहां अबुझमाड़ से भी यादा ट्रेनिंग कैंप नक्सली सालभर चलाते हैं। इस इलाके में नक्सलियों का आधार काफी मजबूत माना जाता हैं। इंटेलीजेंस के मुताबिक यहां अभी महाराष्ट्र, आंध्रा, बिहार, झारखंड व छग के करीब 2000 लोगों को नक्सली ट्रेनिंग दे रहे हैं। करीब सालभर पहले टोही विमान से ली गई तस्वीरों में यहां दर्जनभर से अधिक कैंपों की पहचान की गई थी। टोही विमान से लिए गए चित्रों के जरिए पुलिस ने एक्सपर्ट की मदद से पूरे इलाके का नक्शा तैयार कराया है। जिसमें इन इलाकों की पहाड़ियों की उंचाई, नदियों और तालाबों की चौड़ाई जैसे बारीक आंकड़े तक पुलिस के पास है। पुलिस आपरेशन में इन नक्शों की भी मदद ले रही है। प्रत्येक टीम सेटेलाइट फोन और नाइट वीजन डिवाइस से लैस बताई गई है।

ताबड़तोड़ नक्सली हमले के लिए जिम्मेदार कौन?


पांचवें नंबर से पहले नंबर पर क्यों आया छत्तीसगढ़? 

( 17 दिसंबर 2007 को हिन्दी दैनिक नेशनल लुक में प्रकाशित)

बबलू तिवारी/रायपुर
पांच साल पहले तक छत्तीसगढ़ नक्सलियों के निशाने पर पांचवें नंबर था, लेकिन पिछले चार साल से यह पहले नंबर पर है। नक्सलियों ने अपने रेड कारपेट का केंद्र अबुझमाड़ को बना लिया लिया है। ये सभी तथ्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि क्या राज्य सरकार ने बगैर कोई तैयारी किए ही नक्सलियों को ललकार दिया है। जिसका परिणाम गरीब आदिवासियों और पुलिसकर्मियों की ताबड़तोड़ नक्सलियों द्वारा की जा रही हत्या के रूप में सामने आ रही है। राजधानी में बैठे राजनेता और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जब-जब भी नक्सलियों का जड़ से खात्मा करने का बयान देते हैं, उसके दो-तीन के भीतर नक्सली बेगुनाहों और सुरक्षाकर्मियों को मौत के घाट उतारकर जवाब दे देते हैं। सरकार और पुलिस मुख्यालय सिर्फ भाषणबाजी में लगा हुआ है और नक्सली रोज खून की होली खेल रहे हैं। कल दंतेवाड़ा जेल में हुई घटना के बाद राज्य सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा। नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब नक्सली राजधानी रायपुर पर भी हमला करने में नहीं हिचकेंगे। विपक्ष को भी इस समय राजनीति छोड़कर पुलिसकर्मियों और जनता के लिए नासूर हो चुकी इस समस्या के निदान के लिए राज्य सरकार का साथ देना चाहिए।
नक्सलियों ने इस समय छत्तीसगढ़ को मुख्य केंद्र बना रखा है। जबकि कुछ साल पहले तक आंध्र प्रदेश उनके पहले निशाने पर था। सूत्रों के मुताबिक इस साल अक्टूबर तक नक्सलियों ने अपने प्रभाव वाले 13 राज्यों में 1285 नक्सली वारदातों को अंजाम दिया है, जिनमें 500 वारदातें उन्होंने छत्तीसगढ़ में अंजाम दिया। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में बताया गया है कि इस साल अक्टूबर तक नक्सलियों ने 13 राज्यों में 188 सुरक्षाकर्मियों तथा 383 नागरिकों की हत्या की है, इसमें भी छत्तीसगढ़ में मारे गए सुरक्षाकर्मियों और नागरिकों की संख्या सर्वाधिक है। राज्य शासन को इस बात पर विचार करना चाहिए कि वो कौन से कारण हैं जिसकी वजह से छत्तीसगढ़ पहले नंबर पर आ गया है।

हर कदम पर घोर लापरवाही
कल की घटना के लिए जांच शुरू कर दी गई है, जिसकी गाज कुछ पुलिसकर्मियों पर गिरना सुनिश्चित है, लेकिन राज्य सरकार सिर्फ इन पुलिसकर्मियों को दंडित करके अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। राज्य में नक्सली समस्या शुरू होने के बाद से यह पहला अवसर है,जब नक्सलियों ने किसी जेल से अपने 105 साथियों सहित 298 कैदियों को छुड़ाया है। घटना के बाद जेल के सुरक्षा व्यवस्था के लिए की जाने वाले एहतियात की पोल खुल गई है। जिस समय नक्सली नेता सुजीत ने इस घटना को अंजाम दिया, उस समय जेल के अंदर मात्र चार सुरक्षाकर्मी, वो भी बगैर हथियार के तैनात थे। जेल की सुरक्षा के लिए इस समय 35 सुरक्षाकर्मियों की एक प्लाटून तैनात की गई है। जिसमें से मात्र 29 सुरक्षाकर्मी इस समय डयूटी पर हैं। जेल अधिकारियों ने बताया कि रात में नक्सली हमले की आशंका ज्यादा रहती है, इसलिए रात में ही ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाते हैं। दंतेवाड़ा उप जेल में इस समय दिन की पाली में चार और रात की पाली में दो दर्जन पुलिसकर्मी तैनात किए जा रहे थे। दिन की पाली में सुरक्षाकर्मी बगैर हथियार के ही सुरक्षा व्यवस्था संभालते थे, जबकि रात की पाली में सभी के पास हथियार रहते थे। उप जेल दंतेवाड़ा हेडक्वाटर से करीब दो किमी दूरी पर है। जेल परिसर के पास ही नेता प्रतिपक्ष और सलवा जुड़ूम अभियान की अगुवाई कर रहे महेंद्र कर्मा का पैतृक निवास भी है। इस लिहाज से भी इस इलाके की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रहनी चाहिए थी। सुरक्षा इंतजामों को देखकर लगता है कि जिला प्रशासन और जेल प्रशासन दोनों ने ही सुरक्षा व्यवस्था को लेकर घोर लापरवाही बरती है। जेल में क्षमता से दो गुने से अधिक कैदियों को रखा गया था। यह भी जेल अधिकारियों की लापरवाही को बताता है।
सैकड़ों पुलिसकर्मियों की मेहनत पर फिरा पानी
जिन 105 नक्सलियों को कल नक्सली छुड़ा कर ले गए उन्हें पकड़ने के लिए सैकड़ों पुलिसकर्मियों ने कुर्बानी दी थी। इसमें कई हार्डकोर नक्सली भी हैं, जिन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस के जवानों ने सालोंसाल जंगल की खाक छानी थी। कई पुलिसकर्मी इस दौरान शहीद भी हुए। लेकिन कल जेल प्रशासन की लापरवाही के कारण उनकी बरसों की मेहनत पर पानी फिर गया। बताते हैं कि फरार हुए 105 में से 25 हार्डकोर नक्सली हैं, जिन्होंने सैकड़ों लोगों की जान ली है। इनके भाग निकलने से नक्सल विरोधी अभियान को गहरा धक्का लगा है। इसका खामियाजा प्रशासन को जल्द ही भुगतना पड़ सकता है। सूत्रों का कहना है कि नक्सलियों के साथ भागे अन्य कैदी भी नक्सली कैंप पहुंच सकते हैं। उनके नक्सली बनने की भी आशंका जताई गई है।

आंध्र प्रदेश से सीखे सरकार
आज जिन परिस्थितयों का सामना छत्तीसगढ़ कर रहा है कुछ ऐसी ही हालत पांच साल पहले आंध्र प्रदेश की थी। आंध्र प्रदेश नक्सलियों के पहले नंबर था। लेकिन आंध्र प्रदेश ने इससे निपटने के लिए जो कार्ययोजना बनाई, उसी का परिणाम है कि आज आंध्र प्रदेश में 70 फीसदी नक्सली समस्या खत्म हो गई है। नक्सलियों पर इसका इतना आतंक चढ़ा कि वे आंध्र प्रदेश छोड़कर दूसरे राज्यों में भाग गए। बताते हैं कि आंध्र प्रदेश की योजना नक्सलियों से निपटने में काफी कारगर है। वहां पुलिस फोर्स से दो-दो साल की समयावधि के लिए जवानों को नक्सल आपरेशन पर भेजा जाता है। उन्हें इस दौरान सामान्य से दोगुना वेतन, उनके परिवार की की देखभाल के लिए सुरक्षित जोन, पुलिसकर्मियों का भारी भरकम बीमा करवाया जाता है। इसके साथ ही नक्सलियों के एनकाउंटर पर आकर्षक इनाम भी घोषित है, जो उन्हें एनकाउंटर के बाद मौके पर सीनियर अधिकारी पहुंच कर प्रदान करता है। इंटेलीजेंस के लिए भी राज्य सरकार भारी भरकम राशि खर्च करती है। एसपी स्तर के अधिकारी को सूचना एकत्र करने के लिए 5 लाख तक की राशि प्रत्येक माह दी जाती। वहीं एसडीओपी स्तर के अधिकारी को यह 2 लाख रुपए के करीब है। नक्सल क्षेत्र में तैनात पुलिसकर्मियों को 15 दिन के आपरेशन के बाद 15 दिन छुट्टी दी जाती है। दो साल के बाद उन्हें दोबारा सामान्य वेतन पर दूसरे इलाकों में पदस्थ कर दिया जाता है। आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा नक्सल अभियान पर किए जा रहे खर्च और पुलिसकर्मियों की सुविधा से छत्तीसगढ़ के अभियान की बराबरी नहीं की जा सकती है। हालांकि इसी का परिणाम है कि आंध्र प्रदेश में 70 प्रतिशत नक्सल समस्य खत्म हो गई है।
सुरक्षाकर्मियों के लिए पनिश और नक्सलियों का मिशन
छग सरकार द्वारा नक्सलियों से मोर्चा ले रहे पुलिस व सुरक्षाकर्मियों को अभी प्रदान की जा रही सुविधा नाकाफी है। आज भी नक्सल क्षेत्र में पुलिसकर्मियों को पनिश करने के लिए तैनात किया जाता है। कई नेता और पुलिस अधिकारी सुरक्षाकर्मियों को नक्सली क्षेत्र में भेजने की धमकी देते रहते हैं। वहींनक्सलियों के लिए यह मिशन हैं। राज्य शासन को इस बेसिक फर्क को समझना होगा। पुलिसकर्मियों को जो सुविधा नक्सलियों से जुझने के लिए मिलनी चाहिए वह न के बराबर है। उनके सुरक्षा इंतजाम का भी कोई मजबूत बंदोबस्त नहीं है। नक्सली जब चाहते हैं सुरक्षाकर्मियों को मौत के घाट उतार देते हैं। नक्सली क्षेत्र में तैनात पुलिसकर्मियों का मनोबल भी टूट गया है। ज्यादातर पुलिसकर्मी और अफसर सिर्फ समय काटने में लगे रहते हैं, क्योंकि कार्रवाई के लिए जो सुविधाएं और बैकअप चाहिए वह राज्य सरकार उपलब्ध नहीं करा पा रही। धुर नक्सली क्षेत्र में सैकड़ों थानों में नाममात्र के पुलिसकर्मी बगैर हथियार के तैनात किए गए हैं। जो नक्सलियों के लिए साफ्ट टारगेट हैं। राज्य पुलिस का इंटेलीजेंस नेटवर्क भी इन इलाकों में फेल है। इंटेलीजेंस अफसर अपना पल्ला यह कहकर झाड़ लेते हैं कि उनेक पास पर्याप्त बजट नहीं है। नक्सलियों की एक खबर भी पुलिस को पहले नहीं मिल पाती, जबकि पुलिस की हर हरकत की खबर नक्सलियों को पहले से रहती है। यही हालत सलवा जुड़ूम के कार्यकर्ताओँ और नेताओं की हैं। वे अपनी जान पर खेलकर नक्सलियों से लोहा ले रहे हैं। लेकिन राज्य शासन उन्हें भी सुरक्षा उपलब्ध नहीं करा पा रही है। राज्य सरकार को अभियान की रूपरेखा में बदलाव करना चाहिए। नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब राज्य के सभी 18 जिले नक्सल प्रभावित हो जाएंगे।
सुरक्षा इंतजाम पर उंगली उठाई थी जोगी ने  
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने शुरू से ही राज्य सरकार के इस अभियान का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि राज्य सरकार बगैर पुख्ता प्रबंध के ही अभियान शुरू कर दिया है। इसमें सलवा जुड़ूम के माध्यम से आदिवासियों को जोड़ने पर भी उन्होंने उंगली उठाई थी। उनका कहना था कि ऐसा अभियान तभी चलाना चाहिए जब सरकार आदिवासियों और पुलिस को प्रदान की जाने वाले इंतजाम पूरे कर ले। अन्यथा इसका गंभीर परिणाम बस्तर के निरीह आदिवासियों को भुगतना पड़ेगा। उन्होंने खुला अभियान चलाने से पहले राज्य शासन को पूरी तैयारी करने की नसीहत भी दी थी। लेकिन तब राज्य सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। श्री जोगी की बात अब सच साबित होने लगी है। नक्सली अब और खूंखार हो गए हैं। उनके हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। नक्सल क्षेत्र तथा पुलिस हेडक्वाटर में नक्सल अभियान का जिम्मा उठा रहे अफसर भी ऐसी ही बात करने लगे हैं। उनका कहना है कि राज्य सरकार इस अभियान में सीधा पार्टी बन गई है। जिसकी वजह से नक्सली अपना वजूद दिखाने के लिए लगातार हमले कर रहे हैं, जबकि राज्य सरकार के पास उनसे निपटने के लिए नूल संसाधन ही नहीं हैं। धूर नक्सली जिलों में ही पुलिस फोर्स की भारी कमी हैं। उन्हें अभियान के हिसाब से सुविधा भी नहीं प्रदान की जा रही है। जिससे सुरक्षाकर्मियों का भी मनोबल गिर गया है।

आनलाइन जिंदगी में ताक-झांक



( 7 जनवरी 2007 को दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित)

इक्कीसवीं सदी में पांव रखते-रखते जमाना पूरी तरह हाईटेक हो गया। दुनिया छोटी और जिंदगी आनलाइन हो गई। संचार क्रांति ने पूरी दुनिया को एक सूत्र में तो पिरो दिया लेकिन आनलाइन जिंदगी में ताक-झांक ने सभी की नींदें उड़ा दी हैं। मोबाइल हैंकिंग, क्रेडिट, डेबिट कार्ड के क्लोन बनाकर बैंक खातों के रकम भी पार हो रहे हैं। इंटरनेट और मोबाइल पर सिमट आई दुनिया की पड़ताल कर रहे हैं बबलू तिवारी

आनलाइन जिंदगी में ताक-झांक
पहले दुनिया इंटरनेट के जरिए सिमटी तो बाद में मोबाइल क्रांति ने रही-सही कसर पूरी कर दी। अब जब लोग आनलाइन होकर अपने बहुत से काम मिनटों में निपटाने लगे हैं, तब एक बड़ा खतरा भी पांव पसारने लगा है। वह है लोगों की जिंदगी में इन्हीं आनलाइन तकनीकों के माध्यम से तांक-झांक का। मामला ताक-झांक तक ही सीमित रहे तो भी खैर मानिए। तकनीक के अपराधी तो अब आपकी पर्सनल जानकारी चुराकर न केवल उसका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं, बल्कि इसके जरिए आप को लाखों-करोड़ों का चूना भी लगा सकते हैं। इंटरनेट के जरिए आनलाइन सर्विसेस में सेंध लगाने के साथ अब मोबाइल फोन की भी हैकिंग होने लगी है। न जाने कब आपके इंटरनेट बैकिंग खाते से लाखों-करोड़ों रुपए इधर से इधर हो जाएं। और न जाने कब आप के मोबाइल नंबर तथा क्रेडिट व डेबिट कार्ड का क्लोन बनाकर कोई दूसरा इस्तेमाल कर ले। आनलाइन अपराध में सबसे बड़ी बात यह होती है कि आपको जानकारी होने तक अपराध हो चुका होता है। यहीं नही अपराधी दुनिया भर में कहीं भी बैठकर अपराध को अंजाम देता है। इससे भुक्तभोगी के पास सिवाय हाथ मलने के कुछ नही बचता है। तब पता चलता है कि दुनिया जितनी छोटी है उतनी बड़ी भी।

कौन हैं तांक-झांक करने वाले?
दुनिया का कोई भी व्यक्ति तांक-झांक करने वाला हो सकता है। इन्हें खोजना इतना मुश्किल है जैसे बड़े गंदे तालाब में छोटी मछली ढूढने जैसा। ये लोग भौगोलिक सीमा नही मानते हैं। इनकी कोई पहचान नहीं होती। तकनीकी जानकारों ने इन्हें दो नाम दिए हैं, पहला हैकर्स दूसरा क्रेकर्स। हैकर्स को थोड़ा कम खतरनाक माना जाता है। क्योंकि ये मजे के लिए जानकारियां चुराते और इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्रेकर्स शुध्द रुप से अपराधी होते हैं। या ऐसा भी कह सकते हैं जिन हैकर्स द्वारा किसी वेबसाइट को हैक कर उसकी गुप्त जानकारियों चुराकर उनका इस्तेमाल कर आर्थिक-शारीरिक-मानसिक नुकसान पहुंचाया जाता है उन्हें क्रेकर्स की श्रेणी में रखा गया है। आजकल क्रेकर्स आपस में समूह बनाकर काम करते हैं। इनके सदस्य कई देशों में फैले होते हैं। तथा ये सुनियोजित व संगठित होकर साइबर अपराध को अंजाम देते हैं। इन्हें साइबर अपराधी भी कहा जाता है।

स्थिति भयंकर हो सकती है
अगर जल्द ही हैकर्स पर लगाम नही लगती है तो इन हैकर्स के आतंकवादियों के साथ मिलकर काम करने से दुनिया मुसीबत में फंस सकती है। मान लीजिए किसी हैकर्स ने ही थ्रो या किसी अन्य बड़े एअरपोर्ट के टे्रफिक कंट्रोल सेंटर के कंप्यूटरों में सेंध लगा ले या एअरपोर्ट के रडार के डिस्पले बोर्ड को निष्क्रिय कर दे। या फिर अमेरिका या अन्य देशों के कंप्यूटर नियत्रिंत परमाणु बमों के स्टार्टर पैनल में सेंध लगाकर राष्ट्रपति या रिलीजिंग अथारिटी का पासवर्ड चुरा ले तब क्या स्थिति होगी। यही नहीं दुनिया भर की बिजली सप्लाई, टेलीफोन आपरेटिंग प्रणाली व कंप्यूटर नियत्रिंत पानी सप्लाई व्यवस्था के कंप्यूटर प्रणाली में घुसपैठ करने पर क्या होगा।

साइबर अपराध के प्रकार
0. वेबसाइटों को हैक कर उनकी जरूरी जानकारियों को नष्ट कर साइटों पर अपना संदेश लिख देना
0. सेवा प्रदान करने वाली साइटों को नष्ट कर देना या सूचनाएं चुराकर उनका अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना या फिर उसपर कंट्रोल करके कुछ भी कार्य कर लेना
0. क्रेडिट व डेबिट कार्ड के डिटेल्स चुराकर उसका आनलाइन शापिंग में इस्तेमाल करना
0. इंटरनेट बैकिंग का पासवर्ड चुराकर खाते से पैसे निकाल लेना
0. क्रेडिट, डेबिट व मोबाइल फोन का सोर्स कोड चुराकर क्लोन बनाकर उसका इस्तेमाल करना

कोई भी बन सकता है हैकर्स
हैकर्स बनने की प्रक्रिया इतनी आसान है कि कोई भी कंप्यूटर व इंटरनेट का जानकार इसे कर सकता है। इसके लिए इंटरनेट पर हजारों वेबसाइट उपलब्ध हैं। जिसमें हैकिंग के तरीके के अलावा करीब तीस हजार साइटों के कोड उपलब्ध हैं। इन साइटों से ही आप कई सारे फ्री हैकिंग साफ्टवेयर व एप्लीकेशन डाउनलोड कर सकते हैं। हैकर्स के कई यूनियन भी हैं। जिनके आप सदस्य बनकर हैकिंग के नए-नए साफ्टवेयर पा सकते हैं। साथ ही कई साइटों पर भुगतान के बाद ऐसे साफ्टवेयर उपलब्ध कराए जाते हैं। चीन के लायन नाम के हैकर्स द्वारा बनाई गई हैकर्स यूनियन आफ चाइना को काफी लोकप्रियता मिली है। चीन के खिलाफ काम करने वाली सरकारों की हजारों वेबसाइटों को इस यूनियन ने नष्ट कर दिया। जिसमें व्हाइट हाउस, अमेरिकी दूतावास साइट सहित अमेरिकी सरकार की कई विभागों की साइट, जापान सरकार की कई साइट शामिल हैं।

सजा कम या नहीं के बराबर

साइबर क्राइम में अगर चीन, अमेरिका व बिट्रेन को छोड़ दे तो बाकी देशों में अपराधी के गिरफ्त में आने के बाद भी या तो उसे नाम मात्र की सजा होती है या फिर वह मामूली जुर्माना देकर छूट जाता है। चीन में सबसे ज्यादा कड़ी सजा का प्रावधान हैं। यहां साइबर अपराधियों को मौत तक की सजा दी जाती है। जबकि अमेरिका व बिट्रेन में इसके प्रकार के हिसाब से सजा का प्रावधान है।

पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन
हैकर्स व के्रकर्स दुनिया के किसी भी हिस्से में बैठकर अपराध को अंजाम देते हैं। अलग-अलग देश में बैठकर कर ये एक गिरोह में काम करते हैं। इसका एक उदाहरण भारत में निजी क्षेत्र की आईसीआईसीआई बैंक के साथ सन 2005 में सामने आया। पहले तो स्वीडन के किसी क्रेकर्स ने बैंक के पर्सनल डाटा बैंक में घुसकर ग्राहकों के ईमेल आईडी चुराया। फिर बिट्रेन से इन ईमेल आईडी पर मैसेज भेजा गया कि इंटरनेट बैकिंग के कामकाज को बैंक अपग्रेड कर रहा है। अत: अपने इंटरनेट बैकिंग के खाते में एक बार लागइन करें। मालूम हो कि यह ईमेल आईसीआईसीआई बैंक के कस्टमरकेयर के आईडी से किया गया। लागइन करने के लिए ईमेल में ही एक डायरेक्ट लिंक दिया गया था। लेकिन इस पर लागइन करने पर आईसीआईसीआई बैंक के होमपेज का हूबहू नकली पेज खुलता था। इसपर खाते में लागइन करने के लिए सेम फीचर दिया हुआ था। जांचकर्ताओं ने जब इस पेज की जांच की तो यह जर्मनी में बनाई गई आईसीआईसीआई बैंक के नाम से एक जाली वेबसाइट थी। इस साइट में एक बार अपना आईडी व पासवर्ड डालने के बाद वेबसाइट अपने आप बंद हो जाती थी। तथा कुछ मिनटों के अंदर ही फ्रांस से कोई क्रेकर्स उस आईडी व पासवर्ड की मदद से बैंक की वेबसाइट में लागइन करके खाते में रखी रकम को अमेरिका के किसी बैंक में आनलाइन ट्रांसफर कर लेता था। इस प्रकरण के सामने आने के बाद बैंक को काफी प्रचार-प्रसार करना पड़ा। दूसरी घटना बिट्रेन की है यहां एक के्रडिट कार्ड कंपनी के डाटाबेस से कई ग्राहकों के सोर्स कोड चुराकर उसके क्लोन बनाए गए। फिर उस क्लोन क्रेडिट कार्ड को लेकर एक व्यक्ति इंडिया आता है, तथा विभिन्न बैंकों के लगे एटीएम मशीन से बारी-बारी से पैसे निकालकर यहां से चलता बनता है। मालूम हो कि सभी क्रेडिट कार्ड वीजा, मास्टरकार्ड या इन्हीं की तरह अन्य आनलाइन पेमेंट साफ्टवेटर के डाटाबेस पर रन करते हैं।

एंटी वायरस साफ्टवेयर रखें
इन घटनाओं से पूरा बचाव तो मुमकिन नही है फिर भी एंटी वायरस के उपलब्ध हजारों साफ्टवेयर में से जरूरी साफ्टवेयर अपने कंप्यूटर व मोबाइल में जरूर इंस्टाल करके रखें। ये काफी हद तक हैकर्स के हमले से आपके कंप्यूटर व डाटा को सुरक्षित रख सकते हैं। बगैर पहचान वाली ईमेल व मैसेज न खोलें। ज्यादा आवश्यकता होने पर कंप्यूटर सिक्योरिटी स्पेशलिस्ट की एडवाइज लें तथा उसके सुझाव के अनुसार साफ्टवेयर इंस्टाल करें। कंप्यूटर में उतनी ही जानकारी रखे जितनी जरूरी हों।

हैकर्स की बड़ी वारदातें
0. लव बग वाइरस ने दुनियाभर के लाखों कंप्यूटर प्रणाली व उसमें रखे आकड़ों को नष्ट कर दिया था। इसकी चपेट में अत्यधिक सुरक्षित कहे जानें वाले पेंटागन, सीआईए व ब्रिट्रिश पार्लियामेंट की कंप्यूटर प्रणाली भी आगई थी। इस वायरस की चपेट में आने से करीब 10 बिलियन डालर का नुकसान हुआ था। हालांकि बाद में इस वाइरस को बनाकर फैलाने वाला हैकर्स फीजीउस्मान नामक युवक पकड़ में आ गया था।
0. किम यांग चुंग (लव यू) नामक दक्षिण कोरिया के हैकर्स ने कोरिया के दो टीवी प्रसारण केंद्रों के कंप्यूटर प्रणाली में सेंध लगाकर उसका प्रसारण रोक दिया था।
0. चीन में दो भाइयों ने एक बैंक की कंप्यूटर प्रणाली में सेंध लगाकर 30 हजार डालर पार कर दिए। जिन्हें बाद में पकड़ लिया गया और चीन की सरकार ने उन्हें मौत की सजा दे दी।
0. ऑनलाइन आर्थिक लेन-देन का डाटा व आपरेटिंग सिस्टम उपलब्ध कराने वाली मास्टरकार्ड के डाटा बैंक से सैकड़ों लोगों के डिटेल चुरा लिए गए। जिसमें माइक्रोसाफ्ट के चेयरमेन बिल गेटस के क्रेडिट कार्ड का डिटेल भी शामिल था।
0. लिनक्स,बोब,एमएस डोस 3.3 जैसे प्रसिध्द साफ्टवेयर के सोर्स कोड चुरा लिए गए।
0. सन 2000 में हैकर्स ने बिल गेटस मेलिंडा फाउंडेशन के दानदाताओं के साथ बिल गेटस के पर्सनल कंप्यूटर से पिछले पांच साल के डिटेल में सेंध लगा दिया।
0. एसबीआई बैंक के इंटरनेट बैकिंग के डाटाबेस में सेंध लगाकर कामकाज प्रभावित किया
0. केविन मिटनिक नामक हैकर्स ने अमेरिका की एक टेलीफोन कंपनी का साफ्टवेयर चुरा लिया। इसके बाद उसने क्रेडिट कार्ड कंपनी के डाटाबेस में घुसकर 2 हजार कार्डों का डिटेल चुरा लिया।
0. बैंगलोर के एक हैकर्स ने लंदन के एक व्यक्ति के इंटरनेट बैकिंग खाते में सेंध लगाकर दो करोड़ रुपए पार कर दिए।
0. लिटिलफिच नामक हैकर्स ने सीआईए के कंप्यूटर प्रणाली में सेंध लगाई।

मेरी कुछ खास स्टोरीज



(  29 अप्रैल 2006  को दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित )



( 19 नवंबर 2006 को दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित )



( 16 अप्रैल  2006 को दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित )



( दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित )



( 29 मार्च  2006 को दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित )



( 13 जनवरी  2007 को दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित )



( 20 जनवरी   2007 को दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित )



( 04 अप्रैल  2006 को दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित )



( 9  मार्च  2006 को दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित )



( 13 जनवरी  2006 को दैनिक  देशबन्धु  में प्रकाशित )

"रात का रिपोर्टर"

हरिभूमि समाचार पत्र के रायपुर संस्करण में काम करने के दौरान प्रबंध संपादक आदरणीय हिमांशु जी के निर्देश पर देर रात की खबरों और शहर की सुरक्षा व्यवस्था की तस्वीर सामने लाने के लिए "रात का रिपोर्टर" नाम से एक श्रृंखला शुरू की गई थी, जिसकी जिम्मेदारी हिमांशु जी ने मुझे सौंपी थी। उस दौरान देर रात की गई कुछ चुनिंदा रिपोर्टिंग की पेपर कटिंग यहां प्रस्तुत है-



( 05मई 2006 को प्रकाशित )


( 08 मई 2006 को प्रकाशित )

( 3 अप्रैल 2006 )

( 06 अप्रैल 2006 )


* THE NIGHT REPORTER * THE NIGHT NEWS * NIGHT JOURNALIST * NIGHT CORRESPONDANT *

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट